August 08, 2013

 लघु कथा -"नैसर्गिक न्याय"

  आलोक को आज प्रमोशन मिला है, पिछले दो साल में ये उसका तीसरा प्रमोशन है और क्यों ना हो .... इन दो सालों में आलोक ने अपनी दवा  कंपनी के लिए जी-तोड़ मेहनत  की है। एक छोटी सी कंपनी को प्रादेशिक स्तर  की प्रतिष्ठित कंपनी बनाने में आलोक का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। बॉस मि. मेहता आलोक से खासे प्रसन्न हैं। आज ऑफिस में भी पार्टी थी , आलोक ने घर आते समय बेटे अपूर्व के लिए कुछ कपडे और खिलौने लिए है, कितने दिन हो गए उसे घर में पत्नी और बेटे के साथ समय बिताये हुए ,इन सालों में वो बस मशीन की तरह काम में ही जुटा  रहा। अब कुछ समय फुरसत से घर में भी व्यतीत करूँगा .......  यही सोचते हुए उसने प्रसन्न मन से घर की ओर गाड़ी मोड़ ली। गली के मोड़ पर ही किसी ने बताया ,पत्नी बेटे अपूर्व को लेकर अस्पताल में है ,अस्पताल पहुँच कर पता चला ..... आज  अपूर्व स्कूल की पिकनिक पर गया था ,शहर से २५ किलोमीटर दूर , वहाँ  फिसल कर गिरने के कारण उसके सिर  में चोट लग गयी और स्थानीय डॉक्टर ने उसे कुछ दवा  दी थी ,उसी दवा  के रिएक्शन से अपूर्व की हालत बिगड़ गयी ,आलोक दौड़ कर ICU में पहुंचा ,डॉक्टर ने उसे तसल्ली दी ,अब अपूर्व बेहतर है पर नकली दवा  की वज़ह से ही अपूर्व की ये हालत हुई है। आलोक सन्न रह गया ,पिछले दो सालो में उसने कितनी  नकली दवा छोटे कस्बों और गाँवों  में सप्लाई की है ....... आज अगर अपूर्व को कुछ हो जाता तो? आलोक ने जेब से प्रमोशन लैटर निकाल कर फाड़ दिया और अपूर्व का माथा चूम लिया ......... 

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