आज सुबह से दोपहर तक इंतज़ार था लाइट आने का ,आई भी तो बार-बार जाने के लिए,खैर मेरा किस्सा-ए -इंतज़ार कुछ यूँ है ……………….
ये उन दिनों की बात है जब मॉल ,मोबाइल और मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर नहीं थे ,ये बात है सन १९७४ की ,तब सिनेमा जाने का प्रोग्राम बनना बड़ी बात हुआ करती थी। मुझे अच्छी तरह याद है ,वो एक छुट्टी का दिन था
हम चारों भाई-बहनों ने पापा को घेर-घार कर मूवी जाने का प्रोग्राम बना ही लिया। ये तय हुआ कि ,हम १२ से ३ का शो जायेंगे ,माँ ने जल्दी-जल्दी खाने की व्यवस्था की ,साथ ले जाने के लिए भी मठरी -बिस्कुट रख लिए गए ,हम सब नहा -धो कर तैयार ,भोजन भी हो गया। हमें ११.३० पर निकलना था और ठीक ११. १५ पर पापा के बहुत ख़ास मित्र पधार गए ,(तब लोग बिना पूर्व सूचना के ही आते थे. )अब क्या हो? पंद्रह मिनट में तो वे जाने वाले थे नहीं, पापा ने अन्दर आकर कहा 'चलो कोई बात नहीं हम ३ से ६ वाला शो चलेंगे ,तुम सब अपना होम-वर्क कर लो ,चलेंगे पक्का चलेंगे ,हमारे पास भी बात मानने के सिवा कोई चारा न था। खैर…जब २ बज गए और अंकल नहीं गए तब हमारी बेचैनी बढ़ने लगी ,माँ भी परेशान…फिर हम सबने एक प्लान बनाया औरमै और मेरी छोटी बहन तैयार होकर जूते-मोज़े पहन कर ड्राइंग-रूम में जाकर चहल -कदमी करने लगे।
थोड़ी देर बाद पापा को हँसी आने लगी ,अंकल जी भी कभी हमें देखते तो कभी पापा को। आखिर पापा बोल पड़े दरअसल आज बच्चों को पिक्चर दिखाने ले जाना था,तुम १५ मिनट देर से आते तो ,हम लोग निकल जाते।
अंकल खिसियानी सी हँसी हँस कर बोले तो पहले बताते मैं तो घर में झगडा कर के आया हूँ टाइम पास कर रहा हूँ ,और १५ मिनट बैठता तो ये शो भी छूट जाता। वो बेचारे तुरंत चले गए ,हम लोग भी जल्दी-जल्दी घर से निकले।कौन सी मूवी देखी और कैसी लगी -ये तो याद नहीं पर जाने के लिए जो इंतज़ार किया वो याद रह गया। आज भी हम लोग उस किस्से को याद करके हँस लेते हैं।
ये उन दिनों की बात है जब मॉल ,मोबाइल और मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर नहीं थे ,ये बात है सन १९७४ की ,तब सिनेमा जाने का प्रोग्राम बनना बड़ी बात हुआ करती थी। मुझे अच्छी तरह याद है ,वो एक छुट्टी का दिन था
हम चारों भाई-बहनों ने पापा को घेर-घार कर मूवी जाने का प्रोग्राम बना ही लिया। ये तय हुआ कि ,हम १२ से ३ का शो जायेंगे ,माँ ने जल्दी-जल्दी खाने की व्यवस्था की ,साथ ले जाने के लिए भी मठरी -बिस्कुट रख लिए गए ,हम सब नहा -धो कर तैयार ,भोजन भी हो गया। हमें ११.३० पर निकलना था और ठीक ११. १५ पर पापा के बहुत ख़ास मित्र पधार गए ,(तब लोग बिना पूर्व सूचना के ही आते थे. )अब क्या हो? पंद्रह मिनट में तो वे जाने वाले थे नहीं, पापा ने अन्दर आकर कहा 'चलो कोई बात नहीं हम ३ से ६ वाला शो चलेंगे ,तुम सब अपना होम-वर्क कर लो ,चलेंगे पक्का चलेंगे ,हमारे पास भी बात मानने के सिवा कोई चारा न था। खैर…जब २ बज गए और अंकल नहीं गए तब हमारी बेचैनी बढ़ने लगी ,माँ भी परेशान…फिर हम सबने एक प्लान बनाया औरमै और मेरी छोटी बहन तैयार होकर जूते-मोज़े पहन कर ड्राइंग-रूम में जाकर चहल -कदमी करने लगे।
थोड़ी देर बाद पापा को हँसी आने लगी ,अंकल जी भी कभी हमें देखते तो कभी पापा को। आखिर पापा बोल पड़े दरअसल आज बच्चों को पिक्चर दिखाने ले जाना था,तुम १५ मिनट देर से आते तो ,हम लोग निकल जाते।
अंकल खिसियानी सी हँसी हँस कर बोले तो पहले बताते मैं तो घर में झगडा कर के आया हूँ टाइम पास कर रहा हूँ ,और १५ मिनट बैठता तो ये शो भी छूट जाता। वो बेचारे तुरंत चले गए ,हम लोग भी जल्दी-जल्दी घर से निकले।कौन सी मूवी देखी और कैसी लगी -ये तो याद नहीं पर जाने के लिए जो इंतज़ार किया वो याद रह गया। आज भी हम लोग उस किस्से को याद करके हँस लेते हैं।
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