May 01, 2016

नमस्कार! आज एक अंतराल के बाद पुनः आप सबसे रूबरू हूँ। दोस्तों ,ये तो आप भी मानेंगे कि,जीवन में किसी भी संबंध  के निर्वहन के लिए परस्पर अहम्  के सतुलन का होना बहुत ज़रूरी होता है। छोटी-छोटी बातों पर अहम्  का टकराव परिवार में बड़े विघटन का कारण बनता है। विनोदपूर्ण लहज़े में कहें तो ,हमारी अकड़ तो अनब्रेकेबल होती है परन्तु हमारा अहम्  बड़ा ही fragile होता है। आज मैं आपको "अहम् " पर अपनी रचनाएं पोस्ट करने के लिए आमंत्रित कर रही हूँ। किसी भी विधा में लिखें ,पर लिखें ज़रूर। प्रस्तुत हैं चंद  पंक्तियां


 "इको  फ्रेंडली हो न हों ,ईगो   फ्रेंडली हैं सभी।
 त्याग देते जीर्ण-शीर्ण ,हम अपने परिवेश से ,
 पर पुराने गिले -शिकवे ज्यों के त्यों हैं अभी।
  इको  फ्रेंडली हो न हों ,ईगो  फ्रेंडली हैं सभी।
 हर किसी को  पर कहते सॉरी ,हम कितने आराम से,
 बस संवेदना अपनों के लिए नहीं जगी है कभी।
 इको फ्रेंडली हो न हों ईगो फ्रेंडली हैं सभी।
 बात -बात पर हर्ट होता ये नाज़ुक नाज़ुक अहम् ,
भूलेंगे दूसरों के दोष, बात बनेगी तभी।
इको फ्रेंडली हो न  ईगो फ्रेंडली हैं सभी। "


April 29, 2016

लघु कथा -"दौरा "

 आज  कृषि राज्य मंत्री सूखे की मार झेल रहे गाँव हरितपुर का दौरा  करने वाले हैं। हैलीपैड बनाने  के लिए हज़ारों लीटर पानी बहाया गया है। सरकारी अफसर खेतों में घूम-घूम कर सबसे फोटोजेनिक स्पॉट की खोज कर रहे हैं। आखिर एक खेत मिल ही गया -दरारों से चटकी ज़मीन सूखे का सजीव चित्रण कर रही है। खेत  के मालिक हरिया को ५०० रुपये मिले हैं उसे आसमान में ताकते हुए फोटो खिंचवानी है। बड़ा सरकारी अमला -तमला आया और हरितपुर की बर्बादी पर घड़ियाली आँसू  बहा कर चला गया।
                                                                                                            सुबह अखबार में मंत्री जी की फोटो हरिया के खेत के साथ छपी है।  हरे- भरे लॉन में गरम चाय की चुस्कियों के साथ मंत्री जी अखबार पढ़ रहे हैं। लॉन के बीचो- बीच चलते फौवारे में जल की बूँदें थिरक रही हैं। पर दूर हरितपुर  गाँव में हरिया के खेत की चटकी दरारों में दफ़न उसके सपने अब भी सिसक रहे हैं। 

January 09, 2016

False ceiling in our personality

कल अपनी एक दोस्त के ऑफिस जाना हुआ। कमरे में घुसते ही लग गया कि ,उसने अपने ऑफिस में नए तरह से साज-सज्जा करवाई है। मेरे पूछने पर उसने बताया कि , क्लाइंट्स पर प्रभाव डालने के लिए ऑफिस का भी सुन्दर होना कितना ज़रूरी है। उसने कमरे की फॉल्स सीलिंग दिखाते हुए कहा कि ,पहले ऊपर से आ रही सीलन के कारण दीवारें खराब लगती थीं। अब सारा कुछ फॉल्स सीलिंग के पीछे छिप  गया और कमरे की सुंदरता भी बढ़ गयी। मैं कुछ देर बैठने के बाद जब वहां से चली तो दिमाग में फॉल्स  सीलिंग ही छाई  रही। अचानक ही मन में ख्याल आया -हमारे व्यक्तित्व में भी कई बार कितना कुछ छिपा होता है। जाने-अनजाने हम सभी अपने व्यक्तित्व में फॉल्स सीलिंग बना ही लेते हैं  और जो छिपा रहे हैं उसे अक्सर अनदेखा करते रहते हैं। दरअसल आज की तेजरफ्तार और दिखावा पसन्द ज़िन्दगी में यह एक व्यावहारिक ज़रुरत भी बन गया है। पर लुका -छिपी के इस खेल में हम दोहरे व्यक्तित्व के स्वामी बन जाते हैं, जो आगे चल कर घातक सिद्ध होता है। चलिए माना कि ,हमें अपने व्यक्तित्व के हर पहलू  को सबके सामने खोल कर नहीं रख देना चाहिए ,पर हमें हमारी फॉल्स  सीलिंग के पीछे भी झाँकते  रहना चाहिए और वहां जो  छिपा है ,उसके प्रति हमेशा सजग रहना चाहिए। क्योंकि कई बार हमारे व्यक्तित्व का अनदेखा पहलू  ही हमारी परेशानियों का सबब होता है। 

August 30, 2015

"आज सहेजा  है एक बार फिर  बिखरे मन को
धूमिल आशाओं में छिपे ,  मन के उजलेपन को
आज सहेजा है एक बार फिर बिखरे मन को
उलझे लौकिक  मकड़जाल में,मन के सुलझेपन को
आज सहेजा हैएक बार फिर बिखरे मन को
पूर्ण समर्पण में भी  मिले, मन के उस  अधूरेपन को
आज सहेजा है एक बार फिर बिखरे मन को
भूल गयी थी स्वयं को जिसमे ,मन के उस भोलेपन को
आज सहेजा है एक बार फिर बिखरे मन को
झूठे आडम्बर में रीते ,मन के अनमनेपन को
आज सहेजा है एक बार फिर बिखरे मन को
पल -पल मर कर भी , मन में जीते  नवजीवन को
आज  सहेजा है एक बार फिर  बिखरे मन को "


June 12, 2015

प्रिय  प्रांशु के जन्म-दिन पर   उसके लिए कुछ पंक्तियाँ

"जीवन -पथ पर  बढ़ते जाना
रुक  ना  जाना थक कर तुम ,
हर सोपान  चढ़ते जाना।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाना
सुख के सपने खूब सँजोना ,
पर दुःखों से लड़ते जाना।
जीवन -पथ पर बढ़ते जाना
मिटा कर मन से हर नफरत ,
प्रेम की भाषा गढ़ते जाना।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाना
लेना तुम  सीख हर ठोकर से ,
पथ के कंटक चुनते जाना।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाना
भूल ना  जाना अपनों को ,
पर ग़ैरों  से भी मिलते जाना।
जीवन -पथ पर बढ़ते जाना
खुश रहना औ ख़ुशी लुटाना,
मिले जो ग़म तो सहते जाना।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाना "
रखना लक्ष्य सदैव  शिखर का ,
और जड़ों को सींचते जाना।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाना "
                                         प्रीति 

February 09, 2015

नमस्कार ! दोस्तों आज पुनः रूबरू हूँ आप सब से।  दोस्तों ,जन्म से मृत्यु तक की यात्रा में हम बहुत कुछ संजोते और खोते हैं। पर  पाने और खोने के इस क्रम में एक पूँजी जो हम हमेशा सहेजते रहते हैं ,वो है रिश्ते-नातों की। कुछ रिश्ते तो जन्म के साथ ही बन जाते हैं और कुछ ,ज्यों-ज्यों हम जीवन यात्रा में आगे बढ़ते जाते हैं हमारे साथ जुड़ते जाते हैं। ये भी सत्य है कि , रिश्ते बनाना जितना आसान है ,उन्हें निभाना उतना ही मुश्किल! कई बार कुछ रिश्ते किन्हीं वज़हों से बोझ बन जाते हैं तो कुछ रिश्ते जीवन को महकाते रहते हैं।
इसी विषय पर आपको अपनी भावनाएं व्यक्त करनी हैं एक क्षणिका के माध्यम से। मुझे आप सबकी क्षणिकाओं का इंतज़ार रहेगा। प्रस्तुत है मेरी एक क्षणिका---

"रिश्ते तो होते हैं
पौध समान  ……
उन्हें भी चाहिए
भावनाओं की खाद
गुंज़ाइशों का पानी
थोड़ी धूप  सामंजस्य की
थोड़ी छाँव समझदारी की
तभी निभते हैं वे संपूर्णता के साथ
अन्यथा चुभते रहते हैं
ठूँठ  की तरह उम्र भर !"

December 03, 2014

आज मैं अपने लिखे एक लघु-उपन्यास का अंश आप  सबके साथ साझा कर रही हूँ। इसे मैंने आठ साल पहले लिखा था। इग्नू से रचनात्मक -लेखन के पाठ्यक्रम में ये मेरा प्रोजेक्ट था। मैं किसी को भी टैग नहीं कर रही हूँ ,परन्तु आप सभी की प्रतिक्रिया की मुझे उत्सुकता से प्रतीक्षा रहेगी। इसे दो और कहानियों के साथ प्रकाशित करवाने की ईच्छा  रखती हूँ।

                                                         भग्नांश

"बधाई हो मुक्ता ……बेटी है ,तुम  तो बेटी ही चाहती थीं ना ?सच कितनी प्यारी है। "माँ ने बच्ची को नरम गुदगुदे  कम्बल में लपेट कर बच्ची को मुक्ता  के बगल में लिटा दिया और जब मुक्त ने पहली बार बच्ची को देखा ,तो उसे लगा साक्षात लक्ष्मी जी उसके घर आई हैं। कानों में स्वर गूंजने लगे .............
                                      "महादेवी महालक्ष्मी नमस्ते त्वं विष्णु प्रिये।