February 27, 2014

१-मात्रा --२०

हे ! भोलेनाथ ,नीलकंठ त्रिपुरारी ,
हुई अबेर ,अब सुन लो अरज़ हमारी।
ले लो अब ,अवतार तुम संहारक का ,
अधर्म के बोझ से धरती है भारी।



२-मात्रा -१७

जटा  विराजे गँगा  की  धारा ,
बन नीलकंठ ,पीकर विष सारा।
आये हो हरन को सारे कष्ट ,
जब-जब हमने ,तुम्हें पुकारा।




February 14, 2014

Is pyar ko main kya naam doon ........

कई वर्ष पहले एक फ़िल्म आयी थी -"मेरे महबूब "उस फ़िल्म में आधी फ़िल्म के बाद नायक -नायिका की  नज़रें चार हुई थीं। तब वो फ़िल्म सुपरहिट हुई थी। वो दौर ही कुछ और था ,तब प्यार दिलों में उतरने से पहले फ़िज़ाओं में रचता -बसता  था। प्यार होने से पहले प्यार की  आहट  और प्यार होने के बाद प्यार की  ख़ुमारी  के बीच एक फासला  होता था। 'प्यार दीवाना होता है,मस्ताना होता है ' की  बेफिक्री थी तो 'प्यार से भी ज़रूरी कई काम हैं ,प्यार सब कुछ नहीं ज़िंदगी के लिए 'का नैतिक- बोध भी था। जो प्यार करते थे उसे निभाते भी थे। ,हाँ !'जो अफ़साना किसी अंज़ाम तक लाना न हो मुमकिन ,उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा 'जैसी मिसाल भी देखने को मिलती थी। अपवाद हर युग में होते हैं ,पर पहले प्यार सिरदर्द का सबब नहीं था।
                                                  आज के 'तेरा प्यार यार हुक्कामार 'और 'राम चाहे लीला,लीला चाहे राम ,दोनों के लव में दुनिया का क्या काम 'के दौर में प्यार मानो उपभोग की  चीज़ बन कर रह गया है। हुक्के से निकले धुएँ  के छल्लों में प्यार की  पवित्र भावना कहीं खो गयी है। आज प्यार करने वालों को दुनिया तो क्या ,अपने "अपनों" की  भी परवाह नहीं है। आज फिल्मों की    शुरुआत ही नायक -नायिका के हमबिस्तर होने से होती है। पहले प्यार के सफ़र में समय का मेकअप ,फिर ब्रेकअप और कभी-कभी पैचअप भी। जहाँ पैचअप नहीं होता वहाँ बात अक्सर फेसबुक और ट्विटर पर एक -दूसरे  की फ़ज़ीहत पर ही ख़त्म होती है। संत वैलेंटाइन ने प्यार का सन्देश दुनिया को दिया अच्छा किया ,मगर आज वो जीवित होते तो प्यार के 'तमाशे'को देख कर शर्म से सर झुका लेते। मैं प्यार के ख़िलाफ़  नहीं ,परन्तु आज की  पीढ़ी को अगर अपने निर्णय लेने की  स्वतंत्रता और अधिकार मिला है तो उन्हें अपने परिवार और समाज के प्रति दायित्व-बोध को भी ताक  पर नहीं रखना चाहिए। मैंने बहुत दिनों से कुछ लिखा  नहीं था। आज शाम को जिम से लौटते समय सिटी-मॉल के सामने एक जोड़े की  बेखुदी और बेशर्मी देख कर ये लिखने  पर मज़बूर हूँ -'इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ  ……'

January 01, 2014

नववर्ष के नवप्रभात को देखती हूँ

पाया है ,सहज ही बहुत कुछ  जीवन में ,
पिया है ,गरल  भी कभी मन ही मन में ,
सुख -दुःख की इस  अदभुत बिसात को देखती हूँ।

नववर्ष के नवप्रभात को देखती हूँ।

ठिठक कर रुक गए थे कदम जिस मोड़ पर।,
बढ़ चली हूँ वहीँ से टूटी कड़ियाँ जोड़ कर ,
सीखा था जिनसे सम्भलना ,उन हालात  को देखती हूँ।

नववर्ष के नवप्रभात को देखती हूँ।

चाहा था बदलना ,हर बात को जब-तब ,
टकरा कर यूँ ही शिलाओं से बेमतलब ,
न बदली खुद में ही जो ,उस बात को देखती हूँ।

नववर्ष के नवप्रभात को देखती हूँ।

मोड़ कर मुँह अब  सारी  निराशाओं से ,
मुक्त हो  अतीत की सभी वर्ज़नाओं  से ,
आशाओं के नवीन प्रपात को देखती हूँ।

नववर्ष के नवप्रभात को देखती हूँ।




November 07, 2013

ध्यानमय जीवन शैली 

                                                  "मैं कौन हूँ ?"

 गुरज़िएफ ने एक कोने से इस विधि का प्रयोग किया। सिर्फ यह स्मरण रखना है कि ,मैं कौन हूँ। रमण  महर्षि ने इसका प्रयोग दुसरे कोने से किया। उन्होंने "मैं कौन हूँ " पूछने को एक ध्यान बना दिया। परन्तु मन जो भी उत्तर तुम्हे दे सकता है ,उस पर विश्वास मत करो। मन कहेगा "यह क्या नासमझी की  बात तुम पूछ रहे हो ,तुम यह हो ,वह हो , शिक्षित हो ,अशिक्षित हो ,अमीर हो या गरीब हो। "मन उत्तर देता ही रहेगा पर पूछते ही चले जाओ। कोई उत्तर स्वीकार मत करो ,क्योंकि ,मन के द्वारा दिए सभी उत्तर झूठे हैं। 
वे उत्तर तुम्हारे झूठे हिस्से से आते हैं। वे शब्दों से आते हैं ,शास्त्रों से आते हैं ,संस्कारों से आते हैं,समाज से आते हैं ,दूसरों से आते  हैं। पूछते ही जाओ। "मैं कौन हूँ "के इस तीर को गहरे और गहरे प्रवेश करने दो। एक क्षण ऐसा आयेगा ,जब कोई उत्तर नहीं आयेगा। वही  सम्यक क्षण है। अब तुम उत्तर के करीब आ रहे हो,क्योंकि मन शांत हो रहा है या तुम मन से बहुत दूर चले गए हो। जब कोई उत्तर नहीं होगा और तुम्हारे चारों  ओर  एक शून्य निर्मित हो जायेगा ,तो तुम्हारा प्रश्न पूछना व्यर्थ मालूम होगा। किससे  तुम पूछ रहे हो ?क्योंकि उत्तर देने वाला अब कोई नहीं है। अचानक ,तुम्हारा प्रश्न पूछना भी बंद हो जायेगा। प्रश्न के साथ ही मन का अंतिम अंश भी विलीन हो गया क्योंकि ,वह प्रश्न भी मन का ही हिस्सा था। वे उत्तर भी मन के थे और प्रश्न भी मन का था। दोनों विलीन हो गए तो अब 'तुम' हो। 
                                                       इस प्रयोग को करो ,यदि तुम लगन से लगे रहे तो ,हर सम्भावना है कि यह विधि तुम्हे सत्य की  झलक दे जाए -और सत्य ही शाश्वत है। 
                                                                                                         ओशो 
                               

September 17, 2013

लघु- कथा   -"बुरी लत"   -जगदीश बाबू  ,अपने बेटे -बहू  ,अमित ,नीता और पोते गट्टू के साथ ही रहते हैं। अपनी पेंशन में से कुछ पैसे बचा कर बाकी ,बहू  के हाथ में ही रख देते हैं।  गट्टू को दादाजी के साथ ,खेलना और बातें करना बहुत अच्छा  लगता है पर माँ नीता उसे हमेशा किसी न किसी बहाने से दादाजी के पास जाने से रोकती है। उसका कहना है कि ,पिताजी को पान मसाला खाने की बुरी लत है और गट्टू को उनके साथ नहीं रहना चाहिए। दोपहर में जब वो सोती है तब भी गट्टू अपने दादाजी से दूर ही  रहे ,इसके लिए वह गट्टू को दो घंटे प्ले -स्कूल में भेजना चाहती है। जगदीश बाबू  ने बेटे अमित से बात की है कि , वो दो घंटे गट्टू की अच्छी देखभाल कर लेंगे ,पैसे भी बचेंगे और उनका मन भी लगा रहेगा।  पति और गट्टू की जिद के आगे नीता की एक न चली।
                                 एक महीने में ही गट्टू ने दादाजी से बहुत कुछ सीख लिया है और खेल-खेल में अच्छे संस्कारों व् जीवन मूल्यों का भी निरूपण हो रहा है। इस बार जगदीश बाबू  ने पेंशन बहू  के हाथ में रखी  तो नीता ने कटाक्ष किया ,"क्यों ?इस बार अपनी बुरी लत के लिए पैसे नहीं रखेंगे ?"जगदीश बाबू  ने मुस्करा कर कहा "बहू  वो लत तो छूट गयी और अब जो लत लगी है…. उसका कोई मोल नहीं है,वो है मुझे मिला मेरे पोते का साथ ……………… ."

September 12, 2013





"मिटने  की तैयारी है ,झूठ सत्य पर भारी है।
बिक रहा ईमान यहाँ ,अब हक़ पर सेंधमारी है ,
अब जागो ,आँखें खोलो ,चुप न रहो ,मुँह  से बोलो ,
बहुत सह लिया  हमने ,अब गद्दारों की बारी है "




September 06, 2013

हाइकू लिखने का प्रथम प्रयास………

१ -'झरते पात
      वसंत आगमन
       नव सृजन '

 २ -'तपती रेत
     उबलता सागर
      ग्रीष्म प्रताप '

३-   'बरखा वृष्टि
       नाचे मन मयूर
       पियु की आस '

४-   'ओस की बूँद
        पूर्ण चन्द्र शरद
         अमृत धरा '

५-  ' कंपित  शिरा
       ठिठुरता सूरज
        शिशिर भोर'