July 12, 2012

जुलाई का महीना लखनऊ में दशहरी आम का महीना होता है.जून में बारिश के बाद, जुलाई में दशहरी की मिठास....ये बरसों से मेरे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं.इस बार जून बीत गया ,बहुत  कम   बारिश  हुई.ठेलों पर दशहरी आम सज तो गए, पर सबके मन में एक ही शंका....क्या बिना बारिश के दशहरी मीठा होगा?दो चार दिन हम आमों में मिठास तलाशते रहे और जुलाई आते-आते दशहरी ,मिठास से लबरेज़ हो उठा.किसी ने कहा.........बिना पानी गिरे इतनी मिठास?
 देखिये बात छोटी मगर गूढ़ है....हम कितनी आसानी से अपने सहज स्वभाव को भूल जाते हैं. प्रतिकूल परिस्थितिओं में तो दूर ,हम कई बार सामान्यतः भी अपनी सहजता खो देते हैं. प्रकृति हमें पग-पग पर दर्पण दिखाती है. तो इस जुलाई लखनऊ का दशहरी आम हमारे मुँह में और जीवन में मिठास घोल रहा है ,साथ ही ये सन्देश भी दिलों तक पहुँचा रहा है कि,क्या हुआ गर पानी नहीं बरसा या कम बरसा हम अपनी मिठास क्यों छोड़ें ?
              जाते -जाते दशहरी की शान में यही कहूँगी कि, "आमों में 'आम' नहीं 'ख़ास' है ये,आषाढ़  की पहली बारिश में जीवन का एहसास है ये."
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May 15, 2012

संसद  का साठवां जन्मदिन.......................१३ मई २०१२ ................. टीवी पर सीधा प्रसारण आ रहा था. आम तौर पर खाली-खाली दिखने वाला संसद भवन का सेंट्रल हॉल खचाखच भरा था.उस दोपहर उसी हॉल में चर्चा के दौरान भी बहुत से सांसद नदारद ही थे. पर अभी सब सजे -धजे बैठ कर शास्त्रीय संगीत का आनंद ले रहे थे और शायद मन ही मन रात्रि-भोज के लिए मूड बना रहे थे. तभी एक उदघोषणा के बाद गायिका शुभा मुदगल का आगमन हुआ.वो आयीं ,आराम से गद्दे पर बैठ कर पूरी संसद को आइना दिखा कर चली गयी.उन्होंने शास्त्रीय गायन शैली में दो प्रस्तुतियां दी ,"इतना ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है"(द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)और "मज़हब कोई ऐसा बनाया जाये जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाये"(नीरज)शास्त्रीय शैली में इन गीतों को प्रस्तुत करना एक साहसपूर्ण कदम था, और  इससे उपयुक्त अन्य कोई गीत हमारे माननीयों के लिए हो भी नहीं सकते .शुभा मुदगल वाकई बधाई की पात्र हैं.हम सब तो अपनी-अपनी भड़ास हवा में निकालते रहते हैं. शुभा मुदगल ने उन्हें मिले मौके को व्यर्थ नहीं गंवाया .

May 13, 2012

तूने फूँके प्राण तन-मन में, माँ तुझसे ही है ये जीवन.

तेरी साँसों की लय पर, सीखा मैंने साँसे लेना.
धड़का ये ह्रदय पहले, सुन कर तेरी ही धड़कन.
 
तूने फूँके प्राण तन-मन में ,माँ तुझसे ही है ये जीवन.

तेरे आँचल में ही देखा, पहला सुखद सपन सलोना.
तेरी बाँहों के  झूले में ,मिट  जाती  थी हर  थकन .

तूने फूँके प्राण तन-मन में ,माँ तुझसे ही है ये जीवन .

जीवन-पथ से चुन कर काँटे,सिखलाया सपनों को संजोना.
हर ठोकर पर गोद तुम्हारी,तुमने ही दिखलाया था दर्पण.

तूने फूँके प्राण तन-मन में,माँ तुझसे ही है ये जीवन.

बनाया स्वाभिमानी तुमने,तो तुम्ही से सीखा मैंने झुकना.
देकर संस्कारों की थाती ,बना दिया ये जीवन उपवन.

तूने फूँके प्राण तन-मन में ,माँ तुझसे ही है ये जीवन.

माँ क्या होती है ,ये मैंने माँ बन कर है जाना,
अपने आँचल के फूलोँ पर करती तन-मन-धन और जीवन अर्पण.

तूने फूँके प्राण तन-मन में माँ तुझसे ही है ये जीवन.

May 11, 2012

कल की ब्रेकिंग न्यूज़......"गटर गैस का सांसदों पर हमला!"
 वाह! भाई वाह! ....हम आप तो गली,मोहल्लों,सड़क ,चौराहों पर जब-तब,यहाँ-वहां,गटर गैस की दबंगई से रूबरू होते ही रहते हैं.पर सांसदों की नाक में गटर गैस जाते ही ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती है. वैसे दबंगई से याद आया कि जैसे जहाँ सलमान खान होते हैं वहां कोई टिक नहीं सकता वैसे ही जहाँ गटर गैस होती है वहां भी कोई नहीं रह सकता.चमाचम गाड़ी ,लक-दक पोशाकें ,एसी की ठंडी -ठंडी  हवा .....इसी के आदी  हैं हमारे सांसद ,बेचारे जेब में पड़े रुमाल को तो बाहर  की हवा खाने का मौक़ा ही नहीं मिलता होगा, चलो कम से कम एक दिन नाक पर रखने में उसका होना भी सफल हुआ.पर सोचने वाली बात है कि इतनी कड़ी सुरक्षा के होते गटर गैस संसद में घुसी कैसे?भई बहते पानी और हवा को भी  कभी कोई रोक सका है क्या?और फेंकिये हमारी समस्याओं को गटर में .प्रकृति को जो आप देते हैं वही आपको वापस मिलता है. इसे कहते हैं........."नैसर्गिक न्याय "(natural justice)

May 09, 2012

ये बात पिछले वर्ष मई के महीने की है .........(मैंने ये तभी लिखा था ,पर आप सबके साथ आज अपनी बात साझा कर रही हूँ)टीवी चल रहा था , मै अपने रोज़मर्रा के काम निबटा रही थी. किसी न्यूज़ चैनल पर ख़बरें आ रही थीं. अचानक एक खबर पर कान खड़े हो गए . खाद्य मंत्री संसद में वक्तव्य दे रहे थे ..........."लोग ज्यादा खाने लगे हैं ,इसलिए महंगाई बढ रही है ,लोगों की आमदनी बढ़ गयी है इसलिए महंगाई बढ़ गयी है."आज जब देश का आम आदमी महंगाई की मार से तिलमिलाया घूम रहा है ,तब हमारे देश की संसद में ही ऐसी बेतुकी और बेहूदी दलील दी जा सकती है.लिखने बैठूं तो सुबह से शाम हो जाए और शाम से सुबह.......फिर भी इन माननीयों का महिमा-मंडन ठीक से ना कर पाऊँ . सो अपनी भड़ास चंद छंदों में .......................................
                 "हम तो महंगाई की मार से मरे जाते हैं ,आप कहते हैं कि हम ज्यादा खाते हैं.
                              तो सुनिए हम आपको बताते हैं
                    हम तो हाड़-तोड़ मेहनत से कमाते हैं, जतन से पकाते हैं,
           मिल-जुल कर खाते हैं, फिर भी  कितने बच्चे भूखे ही सो जाते हैं.
              हम तो महंगाई की मार से मरे जाते हैं,आप कहते हैं कि हम ज्यादा खाते हैं.
                            तो सुनिए हम आपको बताते हैं.
             आप हराम का कमाते हैं,लूट-खसोट कर खाते हैं,
     खा-खा कर हमें ही पकाते हैं फिर भी हम आपको बर्दाश्त किये जाते हैं.
       हम तो महंगाई की मार से मरे जाते हैं ,आप कहते हैं क़ि हम ज्यादा खाते हैं.
          तो सुनिए हम आपको बताते हैं.
      बढ़ी हुई कमाई पर हम अपना दिल भी बढ़ाते हैं,पाई-पाई टैक्स की चुकाते हैं.
       बचे हुए में फिर कुछ बचाते हैं ,फिर भी भविष्य की चिंता में घुले जाते हैं.
       हम तो महंगाई की मार से मरे जाते हैं ,आप कहते हैं कि हम ज्यादा खाते हैं.
                 तो सुनिए हम आपको बताते हैं.
             हम जो लें हँस के चुटकी भी ग़र,आप गुस्से से लाल-पीले हुए जाते हैं.
             खुद संसद की गरिमा को रख ताक पर खुद ही उसे गिराते हैं.
              फिर भी सिर तो हम ही शर्म से झुकाते हैं.
        हम तो महंगाई की मार से मरे जाते हैं,आप कहते हैं कि हम ज्यादा खाते हैं.
                        तो सुनिए हम आपको बताते हैं.
आप चुनाव से पहले बरसाती मेंढक की तरह टर्राते हैं,
झूठे वादों से हमें लुभाते हैं,हमारी खुशियों में सेंध लगाते हैं.
            फिर भी हम आपको चेताते हैं कि,संभल जाओ वर्ना अब हम आते हैं.
           हम तो महंगाई क़ी मार से मरे जाते हैं, आप कहते हैं कि हम ज्यादा खाते हैं.

May 01, 2012

                                                 " मन की बात "


"पिछले दिनों घर में पुताई के बाद परदे लगे तो एक खिड़की के परदे बहस का मुद्दा बन गए . हुआ ये कि उस खिड़की के परदों के बीच पहले थोड़ी-थोड़ी जगह रहती थी ,जो अब नहीं थी. मै अड़ी थी कि परदे वही हैं  अब बड़े कैसे हो गए -मुझे नहीं पता. कुछ देर मगज मारने के बाद मैंने सोचा -जहाँ चारों ओर बेपर्दगी की होड़ मची है ,वहां मेरे घर के परदे तो बड़े ही हुए हैं ...मै क्यूँ  परेशान हो रही हूँ . अगली सुबह ध्यान से देखा तो समझ में आया कि  परदों में छल्ले कुछ ज्यादा पड़ गए हैं और उनके फैलने की गुंजाइश कुछ बढ़ गयी है, इसीलिए अब उनके बीच जगह नहीं रह गयी है. इस तरह ये मुद्दा तो ख़त्म हुआ ,पर मेरे सोच-विचार की सुई 'गुंजाइश' पर अटक गयी.सोचने लगी भगवान् ने ह्रदय की संरचना ऐसी बनाई कि वो रक्त के अधिक-कम दवाब को सह सके. उसमे कोई खराबी हो तो डाक्टरों ने उपाय ढूँढ लिया है -एक छल्ला 'गुंजाइश' का (angioplasty/stenting) मगर रिश्तों को निभाने के लिए जो गुंजाइश दिलों में चाहिए उसका क्या? पहले संयुक्त परिवारों में  घर छोटे होते थे ,आमदनी भी कम-कम  होती थी ,पर दिलों में गुंजाइश की कोई कमी नहीं थी.हर कोई एक दूसरे की अच्छाई -बुराई के साथ स्वयं को समायोजित कर ही लेता था. आज बड़ी-बड़ी कोठियां हैं , ऊँचे-ऊँचे ओहदे हैं ,पर दिल में गुंजाइश का टोटा है. अब तो चलती है जोर-आज़माइश, जहाँ जोर नहीं चलता वहीँ हम झुकते हैं, सहते हैं, दबते हैं. मुझे अपनी ही लिखी एक कविता की दो लाइने याद आ रही हैं..................
"यूँ तो बहुत सहते हैं हम दुनिया के सितम , है गुंजाइश अपनों के लिए ही  कम .
                  चुनते सब कुछ नया जीवन में, बस शिकवे ही पुराने ढ़ोते हैं"
         बात छल्लों और परदे से शुरू हुई थी तो, अगर एक ,सिर्फ एक छल्ला 'क्षमा' का हम अपने हृदय में धारण करें तो बहुत सी शिकायतों पर पर्दा पड़ जाएगा ,और उसकी आड़ में कुछ रिश्ते आसानी से निभ जायेंगे."
                                                                                                                         प्रीति  श्रीवास्तव 

April 27, 2012

 पिछली दो पोस्ट की आखिरी कड़ी



उस सुबह मुझे इन्तजार था  अखबार का.............पर एक दिन पहले खोदे गए गढ्ढे  में बाघ गिरा या पड़वा, ये जानने के लिए मुझे तीन-चार दिन इन्तजार करना पड़ा .खबर मिली कि वन-विभाग ही गढ्ढे में गिर पड़ा.मै कुछ लिखती इससे पहले ही हवा उड़ी कि,रहमानखेडा  में ही टाइगर-सफारी बनाई जा   सकती  है और एक जोड़े बाघ-बाघिन से ये शुरुआत हो सकती है.बताया  गया कि यहाँ का कंटीली झाड़ों से घिरा जंगल और साल भर बहता 'बेह्ता' नालाऔर  शिकार के लिए नील गायों की बहुतायत बाघ के स्थायी निवास के लिए अनुकूल है. पक्ष में एक तर्क ये भी दिया गया कि इसी बहाने लोग काकोरी-शहीद स्मारक भी देख लेंगे. मुझे याद आई उस शेखचिल्ली की जो एक टाई से मैचिंग सूट सिलाने चल पड़ा था.अब टाइगर-सफारी बनाना कोई मुँह का कौर तो है नहीं कि उठाया और खा लिया .वहाँ आबादी भी है,आमों के बगीचे हैं,एक अनुसन्धान -केंद्र है जहाँ लगभग तीन सौ  लोग काम करते हैं. फिर माना कि सब हटा-बढ़ा कर वहाँ किसी तरह टाइगर -सफारी बन भी गयी तो क्या गारंटी है कि वहाँ से भी भटक कर बाघ शहर के बीचो-बीच नहीं आ जायेगा. तब क्या करेंगे ? उत्तर-प्रदेश की राजधानी कहीं और ले जायेंगे?पर हम भारतीयों की एक खासियत तो है कि हम मुंगेरी लाल के हसीन सपनो में खो कर हवाई महल बनाने में देर नहीं लगाते. अगले ही दिन से अखबारों में आने लगा कि  'गाँव वाले खुश हैं' 'यहाँ पर्यटक-स्थल बनेगा' 'रोजगार के अवसर बढ़ेंगे ' सरकारी मुआवजा मिलेगा' ये होगा........वो होगा.......इत्यादि-इत्यादि. आजकल का  मीडिया भी बिना कान देखे 'कौवा कान ले गया'.....कौवा कान ले गया ........का शोर मचाने में  पारंगत है. मैं भी सोचने लगी कि कार से जायेंगे और दो घंटे में बाघ- शाघ  देख कर वापस आ जायेंगे.मुझे फिर से अपनी केरल यात्रा याद आई .
कल सुबह का अख़बार देखा तो पहले ही पृष्ठ पर खबर दिखी 'आख़िरकार पकड़ा गया बाघ' पूरा गाँव उसे देखने के लिए उमड़ा. बड़े से पिंजरे में कैद करके उसे पहुँचाया गया दुधवा अभयारण्य में. इस तरह मिशन टाइगर समाप्त हुआ.सबने राहत की सांस ली.गाँव वालों को आजादी मिली दहशत से ,आमों के भी दिन बहुरे.मगर बाघ के फिर से लौटने का खतरा तो बरकरार  ही है. ढाई महीने की मशक्कत के बाद बाघ को न पकड़ पाने पर उस क्षेत्र को ही बाघ संरक्षित घोषित करने की बात करना, मेरे विचार से एक गलती को छोटा करने के लि ए दूसरी बड़ी गलती करने जैसा ही था. अब जब बाघ पकड़ा जा चुका है तो सरकार की प्राथमिकता दुधवा अभयारण्य को अच्छी तरह सील करने की होनी चाहिए 'ताकि फिर कोई बाघ भटक कर बाहर ना आ सके.और अगर काकोरी का नाम आया ही है तो  बाघ का ये प्रवास व उस पर कुर्बान पड्वों,नील गायों ,भैंसों का जीवन, और  सबसे बढ़ कर वन-विभाग की मेहनत सब  सार्थक होंगे अगर अब भी  सरकार काकोरी के शहीद-स्थल को फिर से सँवारती है .अगर ऐसा हुआ तो मैं कहूँगी कि नब्बे सालों के बाद  दुधवा से एक बाघ आया था हमें भारत माता के शेर-दिल सपूतों की याद दिलाने....................