May 23, 2014






अभय-दान 


जगदीश बाबू पिछले बीस दिनों से कोमा में हैं। एक -एक करके शरीर के सभी अँग  जवाब दे रहे हैं ,अब तो डॉक्टरों  ने भी उम्मीद छोड़ दी है। पत्नी निर्मला  उनके सिरहाने ही बैठी रहती हैं। शहर का बड़ा अस्पताल ,नामी डॉक्टरों की  टीम ,तीमारदारी के लिए होड़ लगाते लोग.……………… आखिर जगदीश बाबू का बेटा एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी जो था। बेटा  प्रफुल्ल और बहू  नीता बेचैनी से बार -बार कमरे का चक्कर लगा कर चले जाते। निर्मला  उनके मनोभावों को साफ़ -साफ़ पढ़ सकती है। बाहर  कोई प्रफुल्ल को सलाह दे रहा है -"साहब गौ -दान करा दीजिये ,प्राण अटके हैं पिताजी के आराम से चले जाएंगे " किसी ने पंडित से संकल्प करने की राय दी। निर्मला  ने नज़र भर ,जगदीश बाबू को देखा और  ह्रदय पर पत्थर रख कर पति के कान में कहा "सुनो जी आप आराम से जाओ ,मैं आपके बिना रह लूंगी "जगदीश बाबू मानो  यही सुनना  चाहते थे,निर्मला  ने उन्हें नए सफर के लिए अभय-दान दे दिया था।  कुछ ही पलों में उन्होंने शरीर त्याग दिया।
उनका हाथ अब भी निर्मला  के हाथ में है।  कमरे में हलचल बढ़ गयी है और निर्मला  के ह्रदय में भी। 

May 18, 2014

 'क्षणिका '

 "अक्सर आते हैं
 अतीत के सागर से
 कुछ उफ़ान
 लाते हैं संग में
 भूली यादों के
 ज्वार -भाटे
 मैं किनारे ही खड़ी
 इंतज़ार करती हूँ
 उनके लौट जाने का
 मिल जाते हैं कुछ सीप
 यादों के तुम्हारी
 सहेज लेती हूँ
 ज़ेहन में
 गुज़रे पलों के मोती "

April 08, 2014




"राम तुम्हें लेना ही  होगा अब अवतार,
एक बार नहीं ,आना होगा  सौ-सौ बार।
हुई हानि धर्म की ,फैला पाप चहुँ ओर ,
कब आओगे तारण को हे! नाथ पालनहार।


*******************************

थकी वसुंधरा देखो ढोती पापियों का भार ,
कहाँ गया वो सत्यशील  आचरण सदाचार।
एक तुम्हारा ही सहारा ,मत करना अब निराश ,
आ जाओ हे!दशरथनन्दन करने को उपकार।


*********************************

आये थे तुम करने को एक दशानन का संहार ,
सहा तुम्हीं ने था तब भी हे!सृष्टि-सृजनहार।
हैं यहाँ अब शत मुख वाले शत-शत रावण ,
हो प्रगट अब कोटि-कोटि रूपों में कर दो चमत्कार। "

April 07, 2014

             "विस्मृति"


" आजकल भूलने लगी हूँ ,मैं बहुत …… 
 बत्ती जला कर बुझाना या खुला दरवाज़ा उढ़काना ,
 ढूँढती  फिरती हूँ चीज़ें रख कर ,इधर-उधर। 
 अक्सर भूल जाती हूँ किसी के जन्मदिन की  ताऱीख ,
 याद ही नहीं रहता कल फ्रिज़ में रखा था क्या ,
 भूलती हूँ खाना दवा और उठाना आँगन से कपडे। 
 सोचती हूँ ये बढ़ती उम्र का असर है या पुराना ही कोई सिलसिला ,
 क्योंकि भूली तो पहले भी बहुत कुछ थी................ 
 छोड़ कर भुलाया बाबुल का अँगना  और रिवाज़ ,
 भूली थी अपना बचपना और दिल की  आवाज़। 
  भूलती ही आयी हूँ हर कड़वी बात और अपने जज़्बात ,
  फूलों की  महक में भुला कर काँटों की  चुभन ,
 याद ही नहीं कितना अनसुना किया है मन। 
 बिसरा कर सुध घर की  चाहरदीवारी में भूल ही गयी थी खुद को ,
 कहाँ था याद कि ,एक दुनिया देहरी के उस पार भी है ,
 और सपने भी यहीँ बैठे हैं छत की  मुँडेर  पर। 
 पर वो भूलना भी कोई भूलना था ................ 
 इसीलिए सबने भुला ही दिया उन बातों को ,
 अब जो मैं भूलती हूँ ,तो सब कहते हैं -
 तुम्हें भूलने की  बीमारी हो गयी है............ " 

February 27, 2014

१-मात्रा --२०

हे ! भोलेनाथ ,नीलकंठ त्रिपुरारी ,
हुई अबेर ,अब सुन लो अरज़ हमारी।
ले लो अब ,अवतार तुम संहारक का ,
अधर्म के बोझ से धरती है भारी।



२-मात्रा -१७

जटा  विराजे गँगा  की  धारा ,
बन नीलकंठ ,पीकर विष सारा।
आये हो हरन को सारे कष्ट ,
जब-जब हमने ,तुम्हें पुकारा।




February 14, 2014

Is pyar ko main kya naam doon ........

कई वर्ष पहले एक फ़िल्म आयी थी -"मेरे महबूब "उस फ़िल्म में आधी फ़िल्म के बाद नायक -नायिका की  नज़रें चार हुई थीं। तब वो फ़िल्म सुपरहिट हुई थी। वो दौर ही कुछ और था ,तब प्यार दिलों में उतरने से पहले फ़िज़ाओं में रचता -बसता  था। प्यार होने से पहले प्यार की  आहट  और प्यार होने के बाद प्यार की  ख़ुमारी  के बीच एक फासला  होता था। 'प्यार दीवाना होता है,मस्ताना होता है ' की  बेफिक्री थी तो 'प्यार से भी ज़रूरी कई काम हैं ,प्यार सब कुछ नहीं ज़िंदगी के लिए 'का नैतिक- बोध भी था। जो प्यार करते थे उसे निभाते भी थे। ,हाँ !'जो अफ़साना किसी अंज़ाम तक लाना न हो मुमकिन ,उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा 'जैसी मिसाल भी देखने को मिलती थी। अपवाद हर युग में होते हैं ,पर पहले प्यार सिरदर्द का सबब नहीं था।
                                                  आज के 'तेरा प्यार यार हुक्कामार 'और 'राम चाहे लीला,लीला चाहे राम ,दोनों के लव में दुनिया का क्या काम 'के दौर में प्यार मानो उपभोग की  चीज़ बन कर रह गया है। हुक्के से निकले धुएँ  के छल्लों में प्यार की  पवित्र भावना कहीं खो गयी है। आज प्यार करने वालों को दुनिया तो क्या ,अपने "अपनों" की  भी परवाह नहीं है। आज फिल्मों की    शुरुआत ही नायक -नायिका के हमबिस्तर होने से होती है। पहले प्यार के सफ़र में समय का मेकअप ,फिर ब्रेकअप और कभी-कभी पैचअप भी। जहाँ पैचअप नहीं होता वहाँ बात अक्सर फेसबुक और ट्विटर पर एक -दूसरे  की फ़ज़ीहत पर ही ख़त्म होती है। संत वैलेंटाइन ने प्यार का सन्देश दुनिया को दिया अच्छा किया ,मगर आज वो जीवित होते तो प्यार के 'तमाशे'को देख कर शर्म से सर झुका लेते। मैं प्यार के ख़िलाफ़  नहीं ,परन्तु आज की  पीढ़ी को अगर अपने निर्णय लेने की  स्वतंत्रता और अधिकार मिला है तो उन्हें अपने परिवार और समाज के प्रति दायित्व-बोध को भी ताक  पर नहीं रखना चाहिए। मैंने बहुत दिनों से कुछ लिखा  नहीं था। आज शाम को जिम से लौटते समय सिटी-मॉल के सामने एक जोड़े की  बेखुदी और बेशर्मी देख कर ये लिखने  पर मज़बूर हूँ -'इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ  ……'

January 01, 2014

नववर्ष के नवप्रभात को देखती हूँ

पाया है ,सहज ही बहुत कुछ  जीवन में ,
पिया है ,गरल  भी कभी मन ही मन में ,
सुख -दुःख की इस  अदभुत बिसात को देखती हूँ।

नववर्ष के नवप्रभात को देखती हूँ।

ठिठक कर रुक गए थे कदम जिस मोड़ पर।,
बढ़ चली हूँ वहीँ से टूटी कड़ियाँ जोड़ कर ,
सीखा था जिनसे सम्भलना ,उन हालात  को देखती हूँ।

नववर्ष के नवप्रभात को देखती हूँ।

चाहा था बदलना ,हर बात को जब-तब ,
टकरा कर यूँ ही शिलाओं से बेमतलब ,
न बदली खुद में ही जो ,उस बात को देखती हूँ।

नववर्ष के नवप्रभात को देखती हूँ।

मोड़ कर मुँह अब  सारी  निराशाओं से ,
मुक्त हो  अतीत की सभी वर्ज़नाओं  से ,
आशाओं के नवीन प्रपात को देखती हूँ।

नववर्ष के नवप्रभात को देखती हूँ।