ये बात उन दिनों की है जब पड़ोसियों और रिश्तेदारों के घर जाने के लिए लोग होली का इंतजार नहीं किया करते थे,जब घर की छत पर जाने के लिए सोसाइटी के सेक्रेटरी से छत की चाबी नहीं लेनी पड़ती थी ,जब यूँही ठहाके लगाने के लिए राजू श्रीवास्तव के चुटकुलों की जरूरत नहीं होती थी,जब फिल्मे देखने से पहले लोग उसका रिव्यु नहीं पढ़ा करते थे और जब घड़ी -घड़ी एक -दूसरे का हाल जानने के लिए मोबाइल फ़ोन नहीं थे।ये बात है सन 1986 की,मार्च महीने की सात तारीख -उस दिन ससुराल में मेरी पहली होली थी।सास,श्वसुर,पति ,देवरऔर मैं।पहली बार मैं होली पर अपने माता -पिता और भाई-बहनों से दूर नए परिवेश में थी।उस होली मेरे पापा बहुत बीमार थे और अस्पताल में थे।मुझे उनके पास होना चाहिए था ...........पर विवाह के बाद ये मेरी पहली होली थी,सो परम्परानुसार मैं ससुराल में थी।मम्मी के साथ होली की तैयारियों में लगी तो रही पर मन बार-बार पापा के बारे में सोच कर उदास हो जाता ,बचपन की होली की यादें मन को और भी बेचैन कर जातीं ............मेरी आँखें भर आतीं ...........चुपचाप आंसू पोछ कर फिर किसी काम में लग जाती।घर में सब समझ रहे थे कि ,मैं उदास हूँ तो किसी ने होली खेलने की पहल भी नहीं की।खाना बनने के बाद मैं अपने कमरे में बैठी थी,मेरी नज़र एक खाली बैग पर पड़ी ,ये वही बैग था जिसमे मेरे मायके से होली का शगुन आया था। मैंने उसमे यूँही झाँक कर देखा तो एक कागज़ का टुकड़ा था जिस पर मेरी छोटी बहन ने 'HAPPY-HOLI' और अपना नाम लिखा था।उसे पढ़ते ही मेरा मन एकदम खिल उठा .....मैं कमरे से बाहर आयी ......सामने देवर जी खड़े थे .........रंग तो दिखा नहीं ,मेज़ पर खाने के सामान में मीठी चटनी रखी थी मैंने चटनी लेकर उनके मुँह पर लगा दी .........होली की शुरुआत हो चुकी थी ....रंग भी निकल आया,फिर तो जो होली हुई -उसका वर्णन लिख कर करना मुश्किल है।वो होली मेरे जीवन की यादगार होली बन गयी।आज भी उस होली की याद चेहरे पर मुस्कान ले आती है।अब सोचती हूँ कि ,उस रोज़ अगर मैंने उस बैग में ना झाँका होता तो .....................पर आज जाते-जाते यही कहूँगी कि,'भूल कर सारे मन के मलाल,रंग दो एक-दूजे को लेकर गुलाल' ..............................'.HAPPY-HOLI' .......................PREETI.
March 27, 2013
February 15, 2013
बचपन में ये गाना हमने खूब सुना .......................
"है ना बोलो-बोलो मम्मी बोलो-बोलो,पापा बोलो-बोलो,पापा को मम्मी से,मम्मी को पापा से प्यार है ,प्यार है।"
पापा-मम्मी बच्चों से प्यार करते हैं ये तो हमें पता था,पर वो एक-दूसरे से भी प्यार करते हैं -ये बात हमें ये गाना सुन कर ही समझ में आयी।बात ये नहीं है कि ,हम आज के बच्चों की तरह चतुर-सयाने नहीं थे ,बात है कि तब प्यार के प्रदर्शन का या यूँ कहें कि ,प्यार जताने का चलन नहीं था।भारत में जब वैलेंटाइन-डे आया,तब तक मै दो बच्चों की माँ बन चुकी थी और मेरे बच्चे ये गाना गाने लायक हो चुके थे।
हाँ तो बात प्यार की है तो एक दौर वो था ,जब प्यार का इज़हार होता था ........कॉलेज में फ्री पीरियड में,घर की छतों की मुंडेर पर ,परदे के पीछे, बगीचे में पेड़ के नीचे या किसी भी कोने- अतरे में।दिल से दिल तक प्यार की बात पहुँचने में अरसा लग जाता,कभी मंजिल मिलती और कभी दिल की बात दिल में ही रह जाती।दिल को बहलाने के लिए रफ़ी,मुकेश के गाने ही काफ़ी होते।एक दौर आज का है ................इन्टरनेट है,स्मार्ट फ़ोन हैं ,चुटकी बजाते ही, दिल की बात अगले दिल तक ! अंजाम चाहे जो हो,आगाज़ तो हो ही जाता है।अब प्यार में पड़ना जरूरत बन गया है या यूँ कहें कि,प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है।जो भी हो ...... आज मै क्या गलत है और क्या सही,इस चक्कर में नहीं पड़ने वाली हूँ।मैंने वो दौर भी देखा है और ये भी,तो इतना जरूर कहूँगी कि,प्यार तब भी 'दिल दा मामला' था और अब भी है।दुनिया चाहे कितनी बदल जाये,प्यार की तासीर तो वही रहेगी।
प्यार करने वालों का प्यार अमर रहे इसी दुआ के साथ जाते-जाते फिर एक गाना ............."सोलह बरस की बाली उमर को सलाम,ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम"
"है ना बोलो-बोलो मम्मी बोलो-बोलो,पापा बोलो-बोलो,पापा को मम्मी से,मम्मी को पापा से प्यार है ,प्यार है।"
पापा-मम्मी बच्चों से प्यार करते हैं ये तो हमें पता था,पर वो एक-दूसरे से भी प्यार करते हैं -ये बात हमें ये गाना सुन कर ही समझ में आयी।बात ये नहीं है कि ,हम आज के बच्चों की तरह चतुर-सयाने नहीं थे ,बात है कि तब प्यार के प्रदर्शन का या यूँ कहें कि ,प्यार जताने का चलन नहीं था।भारत में जब वैलेंटाइन-डे आया,तब तक मै दो बच्चों की माँ बन चुकी थी और मेरे बच्चे ये गाना गाने लायक हो चुके थे।
हाँ तो बात प्यार की है तो एक दौर वो था ,जब प्यार का इज़हार होता था ........कॉलेज में फ्री पीरियड में,घर की छतों की मुंडेर पर ,परदे के पीछे, बगीचे में पेड़ के नीचे या किसी भी कोने- अतरे में।दिल से दिल तक प्यार की बात पहुँचने में अरसा लग जाता,कभी मंजिल मिलती और कभी दिल की बात दिल में ही रह जाती।दिल को बहलाने के लिए रफ़ी,मुकेश के गाने ही काफ़ी होते।एक दौर आज का है ................इन्टरनेट है,स्मार्ट फ़ोन हैं ,चुटकी बजाते ही, दिल की बात अगले दिल तक ! अंजाम चाहे जो हो,आगाज़ तो हो ही जाता है।अब प्यार में पड़ना जरूरत बन गया है या यूँ कहें कि,प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है।जो भी हो ...... आज मै क्या गलत है और क्या सही,इस चक्कर में नहीं पड़ने वाली हूँ।मैंने वो दौर भी देखा है और ये भी,तो इतना जरूर कहूँगी कि,प्यार तब भी 'दिल दा मामला' था और अब भी है।दुनिया चाहे कितनी बदल जाये,प्यार की तासीर तो वही रहेगी।
प्यार करने वालों का प्यार अमर रहे इसी दुआ के साथ जाते-जाते फिर एक गाना ............."सोलह बरस की बाली उमर को सलाम,ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम"
February 11, 2013
"आया बसंत ,छाया बसंत ,कण-कण ने गाया बसंत।
झर गए पीले पात सभी,कोंपलों ने देखा नव-प्रभात अभी,
सृष्टि की नवीनता में,होगा मन की मलिनता का अंत।
आया बसंत,छाया बसंत,कण-कण ने गाया बसंत।
फूली सरसों लो बनी पीताम्बर,आमों के भी बौराए शिखर,
धरती की इस उदारता में,होगा मानव की कृपणता का अंत।
आया बसंत,छाया बसंत,कण-कण ने गाया बसंत।
फूलों से बगिया महकी-तितली बहकी,मधु-रितु के मद में डूबी-कोयल कूकी,
प्रकृति की इस सरसता में होगा,जीवन की नीरसता का अंत।
आया बसंत,छाया बसंत,कण-कण ने गाया बसंत।"
झर गए पीले पात सभी,कोंपलों ने देखा नव-प्रभात अभी,
सृष्टि की नवीनता में,होगा मन की मलिनता का अंत।
आया बसंत,छाया बसंत,कण-कण ने गाया बसंत।
फूली सरसों लो बनी पीताम्बर,आमों के भी बौराए शिखर,
धरती की इस उदारता में,होगा मानव की कृपणता का अंत।
आया बसंत,छाया बसंत,कण-कण ने गाया बसंत।
फूलों से बगिया महकी-तितली बहकी,मधु-रितु के मद में डूबी-कोयल कूकी,
प्रकृति की इस सरसता में होगा,जीवन की नीरसता का अंत।
आया बसंत,छाया बसंत,कण-कण ने गाया बसंत।"
February 06, 2013
सर्दी का पलटवार ...............................बचपन में जब भी फरवरी का महीना आता और हम भाई-बहन स्वेटर उतार कर खेलते तो हमारी दादी कहतीं ,"जरा संभल कर रहो, जाड़ा जाते-जाते दुलत्ती जरूर झाड़ता है"समय बीता हम सब बड़े हो गए ,हमारे बच्चे भी बड़े हो गए ,पर दादी की कहावत तो साथ ही रही। अब शायद हमारे बच्चे इसे दोहराएँ। ये भूमिका इसलिए बाँधी क्योंकि ,अब जो मै लिखने जा रही हूँ ,वो एक सत्य घटना है जो मेरे साथ घटी। वर्ष 2007 की फरवरी का दूसरा हफ्ता रहा होगा , जाड़ा बहुत कम हो गया था और मै सोच रही थी कि , कुछ स्वेटर अंदर रख देती हूँ। तभी एक दिन अचानक मौसम ने करवट ली और तेज हवाएं व ओलों के साथ बारिश शुरू हो गयी।जाते-जाते सर्दी फिर पूरे लाव-लश्कर के साथ वापस आ धमकी।मैंने मन ही मन दादी की कहावत फिर दोहराई।तब हमारे घर के बगल में पड़े खाली प्लाट में कुछ मजदूर झोपड़ी बना कर रहते थे। उस रात लगातार हमारे बेडरूम की बाहरी दीवार से खटर -पटर की आवाज़े आती रहीं,हम पति-पत्नी की नींद कई बार टूटी। लेकिन सुबह उठ कर हम अपनी-अपनी दिनचर्या में लग गए और रात की बात भूल गए। शाम को ऑफिस से आकर मेरे पति को रात की बात याद आ गयी और वो उधर देखने चले गए। उन्होंने आकर बताया कि ,झोंपड़ी में मजदूर की पत्नी ने बच्चे को जन्म दिया है और जच्चा-बच्चा को सर्दी से बचाने के लिए वो कोई जड़ी-बूटी कूट रहा था। हम दोनों ने तय किया कि ,उन्हें पुराने कम्बल, चादर वगैरह दे देंगे।मैंने सोचा सुबह बेसमेंट में जाकर निकालूँगी और अपने काम में लग गयी।अगली सुबह जब मै सामान ले कर वहाँ पहुँची तो पता चला कि , बच्चा पिछली रात मर गया और उसकी माँ को तेज बुखार है। मै भारी मन से सामान दे कर चली आई।उस रोज़ मुझसे खाना न खाया गया।कितने ही दिन मै आत्मग्लानि से भरी रही। फिर मैंने एक सबक लिया कि ,अगर आपको किसी की मदद करने का अवसर मिले और आप करना भी चाहते हों तो तुरंत करें। उस समय उठाई गयी थोड़ी सी असुविधा बाद में मिले आत्मसंतोष के आगे कुछ मायने नहीं रखती।
January 11, 2013
'उत्तर-भारत में ठण्ड का कहर ' 'उफ़ ये सर्दी' 'क्या जम जाएगी दिल्ली ' 'सन्डे नहीं ठण्ड -डे '.............ये कुछ हेडलाइंस हैं -भारतीय न्यूज़ चैनलों की। वाकई इस बार सर्दी ने सारे रिकार्ड तोड़ दिए। इस रिकॉर्ड-तोड़ सर्दी में मेरा भी एक रिकॉर्ड टूटा -मै दस दिनों तक घर से नहीं निकली। कल मेरी एक मित्र के कहने पर, उसके साथ मै एक बुटीक में गई। वहाँ का दृश्य बड़ा ही दिलचस्प था ........बड़े से हॉल में सोफे पर दो-तीन सभ्रांत महिलाएं जमी हुई थीं .बीच में मेज़ पर कपड़े फैले हुए थे ,बुटीक मालकिन से उनका किसी ड्रेस की डिजाईन को लेकर डिस्कशन चल रहा था . गर्मागर्म चाय भी सर्व हो रही थी . हॉल के दूसरी ओर तीन-चार दर्ज़ी, मशीनों पर जुटे हुए थे,मास्टरजी कपड़ा नापने-जोखने में व्यस्त थे . मेरी मित्र को उन्हीं से काम था, तो वो उधर व्यस्त हो गई। तब तक मुझे भी चाय ऑफर की गयी ,इतने जाड़े में और क्या चाहिए ......सो, चाय की चुस्कियों के साथ मैंने अपने कान वहाँ चल रही चर्चा की ओर लगाये .......ध्यान से सुनने पर समझ में आया कि ,एक मोहतरमा के घर में इसी जनवरी में शादी है और वो यहाँ अपने कुत्ते गोल्डी की जैकेट सिलवाने आई हैं। कुत्ता क्योंकि fawn colour का है (सॉरी!उन्होंने ब्रीड नहीं बताई)इसलिए जैकेट dark-brown colour की ब्रोकेड की बनेगी, जाड़ा बहुत है,तो नीचे अस्तर लगा कर रुई भरी जाएगी। अस्तर सॉफ्ट होना चाहिए क्योंकि गोल्डी बड़ा ही सेंसिटिव है। हाँ जैकेट में घूँघरू भी लगेंगे।सच!मुझे बड़ा ही रश्क हुआ गोल्डी की किस्मत से ..........मैंने भी एक सलवार-सूट सिलने को दे ही दिया और हम दोनों सहेलियां अपने 'हम-बुटीक गोल्डी की जैकेट'-विषय पर हँसते-बतियाते घर आ गए।कल रात स्वेटर,टोपा -मोजा ,पहने और ऊपर से शाल ओढ़ कर रजाई में बैठे-बैठे मैंने टीवी पर न्यूज़ देखी -'उत्तर-भारत में सर्दी से 180 लोगों की मौत'. सोचने पर मजबूर हो गयी कि ,सर्दी से कोई इंसान कैसे मर सकता है और क्या कुत्ते को वाकई इतनी सर्दी लगती है कि उसे जैकेट पहननी पड़े.......................................
January 01, 2013
..साल 20i5 अतीत की गोद में सरकने को तैयार ,और साल 2016 भविष्य के काँधे पर चढ़ने को बेताब! जाते-जाते साल 2015 को एक नज़र भर कर देखूं तो, घटनाओं और अनुभूतियों की पूरी रील आँखों के आगे खटाखट निकल जाती है .कभी सुभीते से इस रील को आगे-पीछे कर के देखूँगी .आज बात नववर्ष के नव उल्लास की।आने वाला साल अपने साथ क्या लायेगा -ये भेद तो समय के साथ ही खुलेगा .हाँ ! मैंने सोचा है कि ,मै खुश रहूंगी पर किसी के दुःख का कारण भी नहीं बनूँगी .वज़न तो कम जरूर करूँगी ,मगर दिल पर भी कोई बोझ नहीं रखूँगी .पूजा-पाठ करूँगी ,पर कोई वहम नहीं पालूँगी .................................................................................................लिस्ट बहुत लम्बी है ,साल 2017शुरू होने के पहले बताऊँगी कि ,मिशन 2016 कितना सफल रहा ,अभी तो नववर्ष की ढेरों शुभकामनाओं के साथ चंद पंक्तियाँ ..............................................
"शुभ हो नववर्ष -यही है अभिलाषा ,
दूर हो अन्धकार,मन के विकार ,हो मुखरित प्रेम की भाषा .
शुभ हो नववर्ष -यही है अभिलाषा
हो सुगम हर डगर ,टूटे ना सबर ,उपजे हर पल नयी आशा .
शुभ हो नववर्ष -यही है अभिलाषा
सुलझे हर उलझन ,नेह-नातों का बंधन ,ना बदले रिश्तों की परिभाषा
शुभ हो नववर्ष -यही है अभिलाषा " December 11, 2012
आज लगभग तीन महीने बाद कुछ लिखने बैठी हूँ ..इस बीच कुछ लिखने का मन नहीं हुआ -ऐसा तो नहीं ,हाँ कुछ लिखने को नहीं था -ऐसा भी नहीं,फिर..............................कई बार उठते -बैठते ,सोते-जागते,घर के काम निपटाते ,या यूँही सड़क पर आते-जाते ,बहुत सी बातें मन को मथती हैं,मन को छूती हैं,कभी मन को खुश करती हैं,तो कभी दुखी।.पर हर बात को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, या ये कहें कि ,शब्द ही नहीं मिलते .भावनाओं का बवंडर चुप्पी के गहन कूप में समाता जाता है, पर शब्दों की गाँठ खुलती ही नहीं। शब्दों की यही बेरुखी ,किसी भी लेखक या लेखिका की सबसे बड़ी त्रासदी है।मै भी इससे अछूती नहीं हूँ।
आज 'मन' और 'मौन' पर ही कुछ.......................................
"खो गए हैं शब्द सब,अब मौन ही है मुखर .
मन पर हैं परतें बातों की,चुभते शूलों ,सुहानी बरसातों की।
निःशब्द ही रह कर ,चढ़ा भावनाओं के शिखर,
अब मौन ही है मुखर .
मन भी है घटता-बढ़ता , चन्द्रकला की साक्षी देता ,
बंद कपाटों के भीतर , ओढ़े 'चुप' का कलेवर ,
अब मौन ही है मुखर।
मन कहाँ ,कभी ठहरता ,बन पवन-गात सा बहता .
अंतस में उतर कर , जलाये आशा-दीप प्रखर ,
अब मौन ही है मुखर .
खो गए हैं शब्द सब ,अब मौन ही है मुखर।"
आज 'मन' और 'मौन' पर ही कुछ.......................................
"खो गए हैं शब्द सब,अब मौन ही है मुखर .
मन पर हैं परतें बातों की,चुभते शूलों ,सुहानी बरसातों की।
निःशब्द ही रह कर ,चढ़ा भावनाओं के शिखर,
अब मौन ही है मुखर .
मन भी है घटता-बढ़ता , चन्द्रकला की साक्षी देता ,
बंद कपाटों के भीतर , ओढ़े 'चुप' का कलेवर ,
अब मौन ही है मुखर।
मन कहाँ ,कभी ठहरता ,बन पवन-गात सा बहता .
अंतस में उतर कर , जलाये आशा-दीप प्रखर ,
अब मौन ही है मुखर .
खो गए हैं शब्द सब ,अब मौन ही है मुखर।"
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