January 11, 2021

ख़ामोशी


❤️

"ख़ामोशी' ,कई बार होती है ...

बंद कमरे में खिड़की की तरह...

आज़ाद कर देती है,अनकहे लफ़्ज़ों को।

अक़्सर होती है,पुल दो दिलों के दरमियाँ

जहाँ होती है,बस नज़रों की बतकही।

बाज़ दफ़ा ये होती है,सवाल और जवाब

एक ही वक़्त पर,एक ही बात का....

किसी ख़ामोश लम्हे में ही मुक़म्मल होती है अधूरी बात..

. .हाँ! ख़ामोशी रख लेती है आबरू कुछ रिश्तों की"

December 14, 2020

 प्रेम

सागर में ठहरी नदी जैसा 

नदी में थम गयी लहर सा

लहर पर रुके स्पंदन जैसा

स्पंदन में अटकी बूँद सा

इतना गहरा था मेरा मन.......


नैनों से ढलकी बूँद में

अधरों के कंपित स्पंदन में

दबी हँसी की लहर में

अंतस की गहरी नदी में 

पढ़ लिया था मैंने मन तुम्हारा..



June 26, 2020

हाँ!मैं ख़ुश हूँ.... ये कहने से पहले वो,
सुनती है..अपनी मौन अकुलाहटों का कोलाहल,
देखती है....अदृश्य अवसादों की धुंध के उस पार,
और पढ़ती है ...अपना मन ,जो सदा रहा अपठित।

May 07, 2017

"एक कॉल खुद को भी........ "
 
उस रात मुझे ठीक से नींद नहीं आयी। अगली सुबह सो कर  उठी तो मस्तिष्क कुछ उलझा सा था। रोज़ की दिनचर्या से निबट कर ,मैंने आदतन फ़ोन उठाया किसी से बात करने के लिए। मैंने लैंडलाइन फ़ोन से जैसे ही नंबर डायल  किया ,अचानक मेरा मोबाइल फ़ोन बजने लगा ,मैंने दूसरे हाथ से मोबाइल फ़ोन उठाया तो स्क्रीन पर फ़्लैश हो रहा - home calling .मैंने खुद को ही फ़ोन मिला दिया था।   खिसियानी सी हँसी हँस कर मैंने फ़ोन काट दिया और अगला नंबर डायल कर  दिया। सारे दिन कई लोगो से फ़ोन पर बात करके , टीवी देख कर ,वॉट्सएप्प पर मैसेजेस पढ़ कर और इधर-उधर  ठेल  कर ,थोड़ी देर सो कर भी जब दिमाग  शांत नहीं हुआ तो मैंने प्रेमचंद का कहानी संकलन उठा लिया। घंटे भर किताब पढ़ कर जब मैं रात में बिस्तर पर लेटी और अन्मयस्कता का ज्वार कुछ  कम हुआ तो अचानक अंतर्मन से आवाज़ आयी -"कॉल किया भी और बात भी नहीं की ". मैं फिर एकबारगी हँस  पड़ी ,पर दूसरे  ही पल लगा -हाँ ! मुझे तो याद ही नहीं मैंने पिछली बार खुद से कब बात की थी। बात छोटी मगर गूढ़ है -आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में हम खुद को ही भूलते जा रहे हैं। हमें पूरी दुनिया की खबर है स्वयं को छोड़ कर। कनेक्टिविटी का बुख़ार सब पर चढ़ा  हुआ है पर खुद से सब डिसकनेक्ट हैं। किसी महापुरुष ने सच ही  कहा है -"स्वयं से दूर होना ही आनंद से दूर होने का कारण  है।" जाते -जाते बता दूँ कि ,उस रात मैंने अपने आप से एक वायदा किया कि , हर रोज़ सोने से पहले मैं कुछ देर अपने भीतर भी झाकूँगी। उस सुबह मैंने गलती से ही खुद को फ़ोन मिलाया था ,मगर मेरी उस गलती ने मुझे खुद के पास ला दिया ,तो आप ये गलती कब करने जा रहे हैं ?

October 20, 2016

वैसे तो लखनऊ से नाता बहुत पुराना है ,पर पिछले सोलह सालों से मैं लखनऊ में ही हूँ। तो त्यौहारों  का मौसम हो और एक चक्कर अमीनाबाद का न लगे -ये कभी हुआ नहीं। लखनऊ का अमीनाबाद बाज़ार यहाँ के मुख्य बाज़ारों  में है और यह लगभग १६५ साल पुराना बाज़ार  है। जो सामान आपको कहीं नहीं मिले वो अमीनाबाद में ज़रूर मिल जायेगा। मेरे बचपन की बहुत सी यादें अमीनाबाद से जुड़ी  हैं। हमारी दादी जब हमारे घर इलाहाबाद  में होतीं तो दिन भर में एक बार "नखलऊ "और अमीनाबाद का ज़िक्र ज़रूर होता। हम सब उनकी इस बात के लिए खिंचाई भी खूब करते। मेरी मँझली  बुआ जो बहुत सालों  तक अमीनाबाद से सटे  गणेशगंज में रही  ,बाद में महानगर कॉलोनी में शिफ्ट होने के बाद भी उनका अमीनाबाद प्रेम अंत तक कम  नहीं हुआ ,मुझे याद है एक बार उन्होंने मुझसे कहा था कि ,अगर वो 'कौन बनेगा करोड़पति 'में एक करोड़ जीत जाएँ तो सब अमीनाबाद में ही खर्च कर आएंगी। आज बुआ नहीं हैं पर उनकी ये बात याद करके आज भी हम खूब हँस  लेते हैं। और हाँ ! हमारी एक परमप्रिय भाभीजी हैं जो वहीँ पहले उदयगंज में रहती थीं ,कहती हैं -'भई  हमें तो  छींक भी आती थी तो हम अमीनाबाद जाकर ही छींकते थे.' पुराने लखनऊ बाशिंदों का अमीनाबाद प्रेम ऐसा ही है। तो साल भर हम भले ही मॉल में चप्पल घिसें ,दीवाली से पहले अमीनाबाद जाये बिना अपना काम नहीं चलता। इस बार भी झोला लटकाये घूम ही आये प्रताप मार्केट और मोहन मार्केट  की गलियों में।

October 09, 2016

समय जैसे पंख लगा कर उड़ गया और देखते ही देखते मेरी प्यारी बेटी 25 बरस की हो गयी। आज उसके जन्म-दिन पर उसके लिए कुछ पंक्तियाँ -

"पँखों को परवाज़ देना ,ख़ुद  को अलग अंदाज़ देना।

देखे हैं जो तुमने सपने ,अपने मन में
पूरे हों सब -कोशिशों में ऐसा तुम रँग  भर देना,
पँखों को परवाज़ देना ,ख़ुद  को अलग अंदाज़ देना।

ज़िन्दगी की दुश्वारियों में ,उलझ ना  जाना नादानी में
क़शमक़श  के हर पल में ,ख़ुद  को एक आवाज़ देना,
पँखों  को परवाज़ देना ,ख़ुद  को अलग अंदाज़ देना।

चुप ना  रहना ,कभी ना  सहना -बेतरह और बेवज़ह
मन के हर ग़म ,हर पीड़ा को हमेशा तुम अलफ़ाज़ देना ,
पँखों  को परवाज़ देना ,ख़ुद  को अलग अंदाज़ देना।

गुम ना  होना झूठ ,बनावट और फ़रेब  की अंधी गलियों में
अपनी डोर रख अपने हाथ खुद को ऊँची उड़ान देना,
पँखों  को परवाज़ देना ,ख़ुद  को अलग अंदाज़ देना। "

September 02, 2016

jio  G  भर के

 जी हाँ! मुकेश अम्बानी G आ गए हैं ,टोकरी भर-भर के 4G डाटा लेकर। अब  भरिये अपने-अपने फ़ोन में और हो जाईये गुम अंतरजाल की दुनिया में। पहले ही कौन सा ज़मीं ,आसमाँ और सितारों से दोस्ती थी। अब तो शायद घर के एक कमरे से दूसरे  कमरे में बात भी वीडियो कॉल से होगी। दूरसंचार के क्षेत्र में निश्चय ही यह एक बड़ी क्रांति है। प्रधानमंत्री के डिजिटल भारत के सपने को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम। पर क्या भारत में इसका सही उपयोग होने जा रहा है -शायद नहीं !रहने को छत  नहीं ,शौचालय नहीं ,पर आज हर हाथ में फ़ोन है। परंतु  ये स्थिति डिजिटल भारत के सपने को कितना सार्थक करती है -आप ही बताइये। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में 4G का खुला खज़ाना एक छलावा ही है। ये सच है कि ,बहुतों का जीवन इससे बदलेगा बेहतरी के लिए ,पर बहुतों के लिए ये G का जंजाल ही साबित होगा -ये तय है। जो भी हो मेरे लिए जी भर के जीने का मतलब है -सुबह ओस  भरी दूब  में चलना ,उगता और डूबता सूरज देखना ,पहाड़ों की स्थिरता को अपने अंदर समोना और सागर  में उठती  -गिरती लहरों को देख जीवन के सुख-दुःख में संतुलन कायम रखना। मगर इसके लिए 4G की ज़रुरत ही नहीं।  

September 01, 2016

कल घर में सत्यनारायण भगवान् की कथा का आयोजन  था ,जो माह में एक बार होता ही है। हमारे पंडित जी भी पिछले सोलह सालों से हमें हर महीने कथा सुना रहे हैं। कथा के बाद पंडित जी की वार्ता चलती है ,जो पतिदेव बैठ कर सुनते हैं। मैं उस समय रसोई में होती हूँ। कल पति महाशय थे नहीं ,सो रसोई में भी ज्यादा काम नहीं था और पंडित जी की वार्ता भी मुझे ही सुननी थी। प्रसाद ग्रहण करते -करते ,पंडित जी मौसम,खेत -खलिहान से होते हुए अपने गाँव की राजनीति पर आ गए। उन्होंने बारीकी से मुझे समझाया कि , कैसे ग्राम-प्रधानी के चुनाव में गाँव  के पुरवे (मोहल्ले )अलग -अलग जाति  के आधार पर बँट  जाते हैं। यहाँ वोट काटने वाले उम्मीदवार की भूमिका भी अहम् होती है और प्रायः चुनाव से पहले ही तय होता है कि ,कौन जीतेगा। पर इस बार उनके गाँव  में फ़र्ज़ी मतदान हुआ और जिसे नहीं जीतना था वो जीत गया। अब विरोधी दल (जिसमे पंडित जी का लड़का भी है )ने कमिश्नर के पास शिकायत करके चुनाव रद्द करने की अपील की है। जीता  हुआ उम्मीदवार बेचैन है और एड़ी -चोटी  का जोर लगा रहा है। पंडित जी का बड़ा लड़का सचिवालय में ड्राइवर के पद पर तैनात है और वो सीधे प्रमुख -सचिव से कमिश्नर को फ़ोन करवा सकता है -ऐसा पंडित जी ने मुझे बताया। मैं  सुबह से भूखी-प्यासी ,पंडित जी का मुँह  देख कर सोच रही थी कि , जब ग्राम-प्रधान के चुनाव में इतनी उठा-पटक है तो प्रादेशिक स्तर  पर क्या- क्या नहीं होता होगा और सचिवालय में जब ड्राइवर की इतनी हनक है तो अफसरों के तो कहने ही क्या ! मेरे मनोभावों को शायद ताड़ते हुए पंडित जी अपना थैला सम्हालते हुए उठे और बोले ," अब आप कुछ खाइये -पीजिये ,मैं चलूँ। "पंडित जी को गेट तक विदा करते हुए मेरे मष्तिष्क -पटल  पर अखबार में नेताओं और चोरों की लूट -खसूट की खबरे ,टीवी पर दंगल करते चेहरे और आगामी चुनाव की तस्वीर एक साथ तैर गयी। अंदर आकर इत्मीनान से प्रसाद  खाते समय मैं यही सोच रही थी कि ,कोई जीते या हारे पर देश को तो  हम जैसे मध्यम  वर्गीय  लोग ही चलायमान रखे हुए  हैं जो ,सड़क पर बाएँ  चलने से लेकर ईमानदारी से टैक्स भरने के नियमों का पालन करते हैं। 







July 05, 2016

हाँ ! इरफाना  रूही ही था उसका नाम ,वो कक्षा 8 में मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी। मिर्ज़ापुर का बाल -भारती स्कूल  ......... खूब बातें करते थे हम। वो कभी सिनेमा हॉल नहीं गई थी ,तो उसकी सबसे ज्यादा दिलचस्पी मुझसे फिल्मों की कहानी सुनने में ही रहती थी। तब टीवी तो था नहीं। मैं  फ्री पीरियड में उसे देखी हुई पिक्चर की कहानी सुनाती। पर हम भाई-बहनों को तो हमारे माता-पिता "सम्पूर्ण रामायण ","सती अनसुइया ","सती सावित्री ","वीर हनुमान"या फिर देशभक्ति की फिल्में ही ज्यादा दिखाते थे। वैसे "बॉबी "और "शोले " भी दिखाई थी ,पर ऐसी फिल्में कम ही देख पाते थे हम। बहरहाल !मैंने इरफाना  को "सम्पूर्ण रामायण "की कहानी भी सुनाई थी ,जिसे उसने बड़े चाव से सुना था। एक बार ईद के मौके पर मैं  घर में पूछ कर उसके घर भी गई थी। उस रोज़ जब मैंने उसकी दादी को बताया कि ,मैं  रोज़ इरफाना  का टिफिन शेयर करती हूँ,तब उन्होंने मुझसे पूछा था कि , तुम्हारी अम्मा को ये बात पता है ? मैंने क्या जवाब दिया ये तो मुझे याद नहीं परन्तु सोचा  तो तब भी यही होगा कि ,इस बात का  मेरी अम्मा से क्या लेना -देना ?इरफाना  फिल्में नहीं देखती थी ,अपनी गली में दाखिल होते ही ग्यारह साल की इरफाना  अपना सिर ढक  लेती थी और उसे   घर से स्कूल और  स्कूल से घर आने-जाने के सिवा कहीं आने-जाने की छूट नहीं थी। मुझे आज भी याद है एक -दो बार उसने मुझसे कहा था कि , काश!वो मुस्लिम ना होती। वो तो इरफाना  का बाल-मन था। आज वो भी  मेरी तरह युवा बच्चों की माँ  होगी।  आज जब दुनिया भर में इस्लाम की आड़ में जो कुछ हो रहा है इसे लेकर बहस छिड़ी हुई है ,हम बहुत कुछ देख ,सुन और पढ़ रहे हैं ,और हमारे मन में कई द्वन्द पल रहे हैं ,तब इरफाना  के बाल-मन की वो ईच्छा  क्या रूप ले चुकी है ,मैं  ये जानना चाहती हूँ। मुझे नहीं पता मैं  उससे कभी मिलूँगी  या नहीं। पर ये तो सच है कि ,हिन्दू होना और मुस्लिम होना दो अलग बातें हैं ये सबसे पहले उसी ने मुझे बताया था। जाते- जाते बता दूँ कि ,उस ईद मैंने इरफाना  के घर चार-पाँच  तरह की सेवइयाँ  खाई थीं। आज भी  ईद है तो सबको ईद मुबारक!

May 01, 2016

नमस्कार! आज एक अंतराल के बाद पुनः आप सबसे रूबरू हूँ। दोस्तों ,ये तो आप भी मानेंगे कि,जीवन में किसी भी संबंध  के निर्वहन के लिए परस्पर अहम्  के सतुलन का होना बहुत ज़रूरी होता है। छोटी-छोटी बातों पर अहम्  का टकराव परिवार में बड़े विघटन का कारण बनता है। विनोदपूर्ण लहज़े में कहें तो ,हमारी अकड़ तो अनब्रेकेबल होती है परन्तु हमारा अहम्  बड़ा ही fragile होता है। आज मैं आपको "अहम् " पर अपनी रचनाएं पोस्ट करने के लिए आमंत्रित कर रही हूँ। किसी भी विधा में लिखें ,पर लिखें ज़रूर। प्रस्तुत हैं चंद  पंक्तियां


 "इको  फ्रेंडली हो न हों ,ईगो   फ्रेंडली हैं सभी।
 त्याग देते जीर्ण-शीर्ण ,हम अपने परिवेश से ,
 पर पुराने गिले -शिकवे ज्यों के त्यों हैं अभी।
  इको  फ्रेंडली हो न हों ,ईगो  फ्रेंडली हैं सभी।
 हर किसी को  पर कहते सॉरी ,हम कितने आराम से,
 बस संवेदना अपनों के लिए नहीं जगी है कभी।
 इको फ्रेंडली हो न हों ईगो फ्रेंडली हैं सभी।
 बात -बात पर हर्ट होता ये नाज़ुक नाज़ुक अहम् ,
भूलेंगे दूसरों के दोष, बात बनेगी तभी।
इको फ्रेंडली हो न  ईगो फ्रेंडली हैं सभी। "


April 29, 2016

लघु कथा -"दौरा "

 आज  कृषि राज्य मंत्री सूखे की मार झेल रहे गाँव हरितपुर का दौरा  करने वाले हैं। हैलीपैड बनाने  के लिए हज़ारों लीटर पानी बहाया गया है। सरकारी अफसर खेतों में घूम-घूम कर सबसे फोटोजेनिक स्पॉट की खोज कर रहे हैं। आखिर एक खेत मिल ही गया -दरारों से चटकी ज़मीन सूखे का सजीव चित्रण कर रही है। खेत  के मालिक हरिया को ५०० रुपये मिले हैं उसे आसमान में ताकते हुए फोटो खिंचवानी है। बड़ा सरकारी अमला -तमला आया और हरितपुर की बर्बादी पर घड़ियाली आँसू  बहा कर चला गया।
                                                                                                            सुबह अखबार में मंत्री जी की फोटो हरिया के खेत के साथ छपी है।  हरे- भरे लॉन में गरम चाय की चुस्कियों के साथ मंत्री जी अखबार पढ़ रहे हैं। लॉन के बीचो- बीच चलते फौवारे में जल की बूँदें थिरक रही हैं। पर दूर हरितपुर  गाँव में हरिया के खेत की चटकी दरारों में दफ़न उसके सपने अब भी सिसक रहे हैं। 

January 09, 2016

False ceiling in our personality

कल अपनी एक दोस्त के ऑफिस जाना हुआ। कमरे में घुसते ही लग गया कि ,उसने अपने ऑफिस में नए तरह से साज-सज्जा करवाई है। मेरे पूछने पर उसने बताया कि , क्लाइंट्स पर प्रभाव डालने के लिए ऑफिस का भी सुन्दर होना कितना ज़रूरी है। उसने कमरे की फॉल्स सीलिंग दिखाते हुए कहा कि ,पहले ऊपर से आ रही सीलन के कारण दीवारें खराब लगती थीं। अब सारा कुछ फॉल्स सीलिंग के पीछे छिप  गया और कमरे की सुंदरता भी बढ़ गयी। मैं कुछ देर बैठने के बाद जब वहां से चली तो दिमाग में फॉल्स  सीलिंग ही छाई  रही। अचानक ही मन में ख्याल आया -हमारे व्यक्तित्व में भी कई बार कितना कुछ छिपा होता है। जाने-अनजाने हम सभी अपने व्यक्तित्व में फॉल्स सीलिंग बना ही लेते हैं  और जो छिपा रहे हैं उसे अक्सर अनदेखा करते रहते हैं। दरअसल आज की तेजरफ्तार और दिखावा पसन्द ज़िन्दगी में यह एक व्यावहारिक ज़रुरत भी बन गया है। पर लुका -छिपी के इस खेल में हम दोहरे व्यक्तित्व के स्वामी बन जाते हैं, जो आगे चल कर घातक सिद्ध होता है। चलिए माना कि ,हमें अपने व्यक्तित्व के हर पहलू  को सबके सामने खोल कर नहीं रख देना चाहिए ,पर हमें हमारी फॉल्स  सीलिंग के पीछे भी झाँकते  रहना चाहिए और वहां जो  छिपा है ,उसके प्रति हमेशा सजग रहना चाहिए। क्योंकि कई बार हमारे व्यक्तित्व का अनदेखा पहलू  ही हमारी परेशानियों का सबब होता है। 

August 30, 2015

"आज सहेजा  है एक बार फिर  बिखरे मन को
धूमिल आशाओं में छिपे ,  मन के उजलेपन को
आज सहेजा है एक बार फिर बिखरे मन को
उलझे लौकिक  मकड़जाल में,मन के सुलझेपन को
आज सहेजा हैएक बार फिर बिखरे मन को
पूर्ण समर्पण में भी  मिले, मन के उस  अधूरेपन को
आज सहेजा है एक बार फिर बिखरे मन को
भूल गयी थी स्वयं को जिसमे ,मन के उस भोलेपन को
आज सहेजा है एक बार फिर बिखरे मन को
झूठे आडम्बर में रीते ,मन के अनमनेपन को
आज सहेजा है एक बार फिर बिखरे मन को
पल -पल मर कर भी , मन में जीते  नवजीवन को
आज  सहेजा है एक बार फिर  बिखरे मन को "


June 12, 2015

प्रिय  प्रांशु के जन्म-दिन पर   उसके लिए कुछ पंक्तियाँ

"जीवन -पथ पर  बढ़ते जाना
रुक  ना  जाना थक कर तुम ,
हर सोपान  चढ़ते जाना।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाना
सुख के सपने खूब सँजोना ,
पर दुःखों से लड़ते जाना।
जीवन -पथ पर बढ़ते जाना
मिटा कर मन से हर नफरत ,
प्रेम की भाषा गढ़ते जाना।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाना
लेना तुम  सीख हर ठोकर से ,
पथ के कंटक चुनते जाना।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाना
भूल ना  जाना अपनों को ,
पर ग़ैरों  से भी मिलते जाना।
जीवन -पथ पर बढ़ते जाना
खुश रहना औ ख़ुशी लुटाना,
मिले जो ग़म तो सहते जाना।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाना "
रखना लक्ष्य सदैव  शिखर का ,
और जड़ों को सींचते जाना।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाना "
                                         प्रीति 

February 09, 2015

नमस्कार ! दोस्तों आज पुनः रूबरू हूँ आप सब से।  दोस्तों ,जन्म से मृत्यु तक की यात्रा में हम बहुत कुछ संजोते और खोते हैं। पर  पाने और खोने के इस क्रम में एक पूँजी जो हम हमेशा सहेजते रहते हैं ,वो है रिश्ते-नातों की। कुछ रिश्ते तो जन्म के साथ ही बन जाते हैं और कुछ ,ज्यों-ज्यों हम जीवन यात्रा में आगे बढ़ते जाते हैं हमारे साथ जुड़ते जाते हैं। ये भी सत्य है कि , रिश्ते बनाना जितना आसान है ,उन्हें निभाना उतना ही मुश्किल! कई बार कुछ रिश्ते किन्हीं वज़हों से बोझ बन जाते हैं तो कुछ रिश्ते जीवन को महकाते रहते हैं।
इसी विषय पर आपको अपनी भावनाएं व्यक्त करनी हैं एक क्षणिका के माध्यम से। मुझे आप सबकी क्षणिकाओं का इंतज़ार रहेगा। प्रस्तुत है मेरी एक क्षणिका---

"रिश्ते तो होते हैं
पौध समान  ……
उन्हें भी चाहिए
भावनाओं की खाद
गुंज़ाइशों का पानी
थोड़ी धूप  सामंजस्य की
थोड़ी छाँव समझदारी की
तभी निभते हैं वे संपूर्णता के साथ
अन्यथा चुभते रहते हैं
ठूँठ  की तरह उम्र भर !"

December 03, 2014

आज मैं अपने लिखे एक लघु-उपन्यास का अंश आप  सबके साथ साझा कर रही हूँ। इसे मैंने आठ साल पहले लिखा था। इग्नू से रचनात्मक -लेखन के पाठ्यक्रम में ये मेरा प्रोजेक्ट था। मैं किसी को भी टैग नहीं कर रही हूँ ,परन्तु आप सभी की प्रतिक्रिया की मुझे उत्सुकता से प्रतीक्षा रहेगी। इसे दो और कहानियों के साथ प्रकाशित करवाने की ईच्छा  रखती हूँ।

                                                         भग्नांश

"बधाई हो मुक्ता ……बेटी है ,तुम  तो बेटी ही चाहती थीं ना ?सच कितनी प्यारी है। "माँ ने बच्ची को नरम गुदगुदे  कम्बल में लपेट कर बच्ची को मुक्ता  के बगल में लिटा दिया और जब मुक्त ने पहली बार बच्ची को देखा ,तो उसे लगा साक्षात लक्ष्मी जी उसके घर आई हैं। कानों में स्वर गूंजने लगे .............
                                      "महादेवी महालक्ष्मी नमस्ते त्वं विष्णु प्रिये।
                                        

October 20, 2014

आज चिठ्ठी -पत्री  की बात………इस दीवाली अपनी आलमारी  ठीक करते समय पुरानी चिठ्ठियों का थैला हाथ लग  गया ,दोपहर से शाम हो गयी पुराने खतों को पढ़ते -पढ़ते। कितनी भूली यादें फिर से ताज़ा हो गयीं। सोचने बैठूँ  तो ख़त  की दुनिया से मेरा प्रथम परिचय मेरी दादी ने कराया। वो मुझसे चाचा और बुआ के लिए खत लिखवाती। वो बोलती जातीं और मैं लिखती, बड़ा मज़ा आता। मैं हर चौथे दिन उनके पीछे पड़ती चलो अम्मा खत लिखें। वो  कहतीं -अरे पहले जवाब तो आने दो। जवाब में खत आता तो वो भी हम ही पढ़ते। खत के अंत में अपने लिए प्यार भी मिलता। कभी-कभी मैं कहती -अरे अम्मा तुमने ये बात तो चाचा के खत में लिखवाई ही नहीं ,तब वो समझातीं -अरे नहीं बेटा  ये बात खत में लिखने वाली थोड़ी  है। इस तरह हमें ख़तो -किताबत का इल्म हुआ। स्कूल के दिनों में जब कभी स्कूल से अनुपस्थित होना पड़ता तो अपनी छोटी बहन का इंतज़ार करती ,वो मेरी सहेलियों की चिठ्ठी लेकर आती। उस दिन क्या पढाई हुई और क्या होमवर्क मिला -ये हमें उस खत से ही पता चलता तब फ़ोन तो था नहीं। पापा का ट्रान्सफर  होने पर दूसरे  शहर जाकर पुरानी सहेलियों को खत लिखे जाते ,लिखते समय आँखे भर आती और जवाब मिलता तब भी रोना छूट जाता। कितने ख़त  चचेरी ,ममेरी बहनों को भी लिखे। सबसे दिलचस्प होता था ख़त  के जवाब का इंतज़ार। डाकिये को घर की ओर  आता देख कर ही धड़कने बढ़ जाती ,हम भाई -बहनों में चिठ्ठी की छीनाझपटी भी खूब होती और कभी-कभी चिठ्ठी बिना पढ़े ही फट जाती ,तब हम उसे जोड़ कर पढ़ते। मुझे याद है ,जब मेरी शादी तय हुई -मैं और मेरे होने वाले पति एक ही शहर में थे ,पर फ़ोन की सुविधा नहीं थी और मिलने की आज्ञा नहीं थी। शादी से पहले के ६ महीने हम दोनों ने एक-दूसरे  को बहुत से ख़त  लिखे। आज भी जब उन्हें पढ़ती हूँ तो बहुत अच्छा लगता है। फिर शादी के बाद माँ -पापा से दूर होने पर उनके खतों का इंतज़ार रहता। कहने का तात्पर्य यह कि  ,चिठ्ठी -पत्री  का हमारे जीवन में बहुत अहम स्थान था। कितने दिनों तक कोई बात सोच कर ख़त  में लिखी जाती थी। आज की तरह थोड़ी कि , जो मन में आया तुरंत वाट्सएप्प  पर लिख मारा। संचार क्रान्ति ने हमारा जीवन ही बदल दिया है। मैं भी सोचूँ तो मैंने भी आखिरी बार कब -किसको ख़त  लिखा था ,याद नहीं। ये तो अच्छा है कि , अब हमें बाहर  रह रहे अपने बच्चों का और अपने वृद्ध माता-पिता का हाल जानने के लिए कोई इंतज़ार  नहीं करना पड़ता। अब सब बस एक फ़ोन -कॉल  की दूरी पर ही है। पर खतों की बात ही अलग थी ,एक ही ख़त  में पूरे घर के लोगों के लिए कुछ ना  कुछ अवश्य रहता था ,चाहे सादर प्रणाम और प्यार स्नेह ही क्यों ना  हो। 

October 09, 2014



"मधुर चाँदनी  से बन आये थे तुम जीवन में,
रस  प्रेम-सुधा बन छाए थे तन-मन में।
कितने  पूनम, फिर कितनी अमावस,
मिल कर भोगे ,जीवन के सब नवरस।
आये  वसन्त, फिर  गए जो पतझड़ ,
वो गूँज हँसी की, आँसू  की हर लड़।
बन गयी हैं थाती, जीवन की अब,
जो कहीं थीं बातें तुमने तब।
जीवन की साँध्य बेला  में आज,
अब जाकर जाना ये राज।
बोते हैं जो हम जीवन में कल,
जीते आज उसी को पल-पल।
लो उम्र इस बंधन की, सुनहरी सूर्य-किरण सी हो गयी,
कुछ बातें तेरी-मेरी ,फिर भी क्यूँ अनकही सी रह गयीं। "
                                         
               




October 01, 2014

आज जब  मैंने अपने यहाँ सफाई करने वाले लड़के से कहा कि ,"तुम्हारी  झाड़ू ख़राब हो गयी है ,नयी ले आओ "तो वह बोला ,"मैडम २ अक्टूबर के बाद मँगाइएगा ,आजकल झाड़ू महंगी बिक रही है। "मैं अपनी हँसी  रोक पाती ,इससे पहले ही वह फिर बोला ,"मैडम कल नहीं आऊँगा। कल पार्क में डबल ड्यूटी करनी है ,परसों साहब लोग झाड़ू लगाने आ रहे हैं तो कल पार्क चकाचक साफ़ किया जायेगा। "(दरअसल वो एक स्थानीय पार्क में सफाई कर्मी है और पार्ट-टाइम हमारे घर में भी काम करता है ,जिससे उसे कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।) शाम को पति देव भी भुनभुनाते हुए घर में घुसे -"क्या यार दो अक्टूबर को भी ऑफिस जाना है। " मैंने तंज़ कसा  -अच्छा झाड़ू लगाने ! वो तुनके -हुंह ! हम क्यों लगाएंगे  झाड़ू ,जो १५ अगस्त और २६ जनवरी को गुब्बारे और कबूतर उड़ाते हैं वही लोग  झाड़ू भी लगाएंगे। पर जाना तो पड़ेगा ही। मुझे अपनी दादी की एक कहावत याद आई -एक जना  झाड़ू लगाये तो एक उसकी कमर पकडे। मोदी जी ने झाड़ू पकड़ने का संकल्प क्या लिया ,पूरा देश  झाड़ूमय  हो गया। लक -दक  सूट -बूट झाड़ कर ,झाड़ू फिरा कर ,हाथ झाड़ कर मीडिया को बाइट देने की होड़ मची है। प्रधानमन्त्री से लेकर मंत्री ,नेता अफसर सभी नयी नवेली झाड़ू हाथ में लेकर निकलेंगे और फिर कैमरे  की ज़द के बाहर  इन झाड़ूओं का अम्बार औने -पौने बिक जायेगा।  नयी झाड़ू तो मैं २ अक्टूबर  के बाद ही  खरीदूँगी। पर मज़ाक से इतर एक बात विचारणीय है कि  ,साल में एक दिन स्वच्छता अभियान अपनी प्रतीकात्मकता को साल  के अन्य ३६४ दिनों में भी बनाये रखे तो कुछ बात बने। दरअसल स्वच्छता अभियान से नहीं हमारी सोच में बदलाव से होगी। बड़ी-बड़ी कोठियों में मार्बल फर्श की स्कर्टिंग तक को नौकरों से रगड़वाने वाली सभ्रांत महिलाये ये सोचना भी नहीं चाहतीं कि ,उनके घर का कूड़ा नौकर कहाँ फेंक रहा है। हर गली ,नुक्कड़,चौराहों पर जमा कूड़ा ये तो बताता है कि  ,हमारे घर बहुत साफ़ हैं। पर यही कूड़ा नालियों में फंस कर सीवर जाम करता है और फिर सीवर भी सड़क पर बहता है।'मन की बात' लिखते समय  मैं गूगल बाबा की मदद  कम  ही लेती हूँ ,पर मेरे सीमित ज्ञान के हिसाब से भी कम से कम  हर १. ५ किलोमीटर पर एक सफाईकर्मी तो होना ही चाहिए। जब से सफाई का काम नगरमहापालिका द्वारा ठेके पर दिया जाने लगा ,तबसे सफाई व्यवस्था और  भी चरमरा गयी है। कर्मचारियों की कमी तो है ही। सफाई के आधुनिक उपकरण और सीवर साफ़ करने वाली मशीने भी स्टोर में पड़ी ज़ंग खाती हैं। शराब पीकर सफाईकर्मी सीवर में घुस कर सफाई करता है। आये दिन सफाई कर्मी हादसों का शिकार होते हैं ,जिसका कोई मुआवज़ा सरकार द्वारा नहीं दिया जाता। सफाई के काम को एक वर्ग-विशेष से जोड़ कर देखना -यह भी शायद हमारे देश की ही विशिष्टता है। मोदी जी की ये सांकेतिक पहल अच्छी है। इस अभियान के लोगो में गांधी जी के चश्मे का प्रयोग किया गया है। पर फैशन के इस दौर में गाँधी  का चश्मा आउटडेटिड है और फिर चश्मा चाहे कोई भी हो अगर उसके पीछे की आँखे बंद होंगी तो अपने घर से बाहर  की गंदगी हमें उतनी देर ही उद्वेलित करेगी ,जितनी देर जेब से रुमाल निकाल कर नाक पर रखने में लगती है। प्रधानमंत्रीजी और उनके अमले को यह समझना ज़रूरी है कि  ,देश ,प्रदेश ,शहर ,गाँव ,गली नुक्कड़ हर जगह कूड़ा -प्रबंधन एक गंभीर समस्या है ,जिसे बहुत ही व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढँग  से दूर करने की पहल होनी चाहिए। निश्चय ही कोई भी व्यवस्था अपने उद्देश्य में तभी सफल होती है जब कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी से हो। तो मेरे विचार से मोदी जी की झाड़ू पहले भ्रष्टाचार पर ही चलनी चाहिए। सड़के खुद-ब  -खुद साफ़ हो जाएंगी। 

September 18, 2014

"ये ज़िंदगी………
रफ़्ता -रफ़्ता  आगे बढ़ती
उम्र के साथ पूरी होती
कभी सपनो के पीछे भागती
तो कभी प्रारब्ध से हारती
करनी के संग-संग
पाप और पुण्य के खाते में
लम्हा-लम्हा दर्ज़ होती
ये ज़िंदगी ………"